#गोंडा_के_कलहंस_परिहारों_का_इतिहास
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14 वीं शताब्दी में इस क्षेत्र में #डोम_राजाओं का शासन था। डोम शासक ने एक बार एक ब्राह्मण की लड़की से जबरन विवाह करना चाहा तो सुल्तानपुर के कायस्थ राजा जगत सिंह ने बन्धलगोति, बैस, बिसेन और कलहंस सेना-नायकों के साथ इलाके पर धावा बोलकर 'डोम-शासन' का अंत कर दिया। उनके साथ आये राजपूत जमींदारों-सेनापतियों ने यहां अपने अलग -अलग राज्य कायम किये।
इन कमांडरों में सबसे प्रसिद्ध सहज सिंह कलहंस थे, जो परिहार थे और #गुजरात_राजस्थान_सीमा से आये थे।
कलहंस इनकी उपाधि थी, जो अपना पितामह #मोकल_राणा_परिहार को मानते हैं। मोकल राणा परिहार (एक मोकल राणा मेवाड़ के भी थे, ये दूसरे हैं)
राजस्थान के #मण्डोर के शासक थे, जिनके वंशज अब #इंदा_परिहार कहे जाते हैं।
गोंडा में राजा सहज सिंह ने पहली रियासत खुरासा कायम की जो बाद में राजा अचल सिंह के बाद 6 द्वारों में बंट गई।
परिहारों का #आदिवराह_सम्राट_मिहिरभोज परिहार के समय से #वाराह_अवतार से विशेष नाता रहा है, जो यहां आकर और अधिक स्थापित हो गया क्योंकि 'गोंडा' के पसका में #सूकरखेत को ही 'वाराह-अवतार' से जोड़ा जाता रहा है।
परिहारों ने यहां न केवल वराह मन्दिर बनवाया बल्कि वाराही देवी की शक्तिपीठ स्थापित की,जिसे #उत्तरी_भवानी कहते हैं.
मेरा मातृ कुल चूंकि कलहंस परिहार है तो इस इतिहास को ढूंढने में मेरी विशेष रुचि थी, जो तमाम ब्रिटिश गजेटियर और राजस्थान के मण्डोर(जोधपुर) के इतिहास को एक साथ देखने से पूरी हुई!
उत्तरी भवानी के मन्दिर और पसका के संगम क्षेत्र में जाकर एक जिज्ञासा उमड़ती थी की आखिर वाराह अवतार से इन लोगों का क्या सम्बन्ध है ?
जब मिहिरभोज के बारे में पढ़ा और जाना की वो 'आदि-वाराह' उपाधि लगाते थे ,साथ ही पुष्कर में भी मण्डोर के परिहारों ने वाराह मन्दिर बनवाया तो एक सिलसिला मिलता चला गया,ढूंढते रहिये एक दिन कुछ न कुछ मिल ही जाता है|
नोट-चित्र में सम्राट मिहिरभोज परिहार की शासकीय मुद्रा ,जिसमें 'वाराह-अवतार' अंकित था।
दूसरी फोटो भगवान विष्णु की है जो उत्तरखण्ड के काशीपुर से मिली और मिहिरभोज परिहार के काल की है।
साभार...
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कमी पहा

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