Wednesday, 4 February 2026

हिराबाई पेडणेकर:



 हिराबाई पेडणेकर:

मराठीतल्या पहिल्या महिला नाटककार, ज्यांची नाटकं केवळ 'कलावंतिणीचं घराणं' म्हणून नाकारली
"पुरुषानेही स्त्रीवर अव्यभिचारी, अचल प्रेम करायला हवे. स्त्रीनिष्ठा अपेक्षिणाऱ्या पुरुषांच्या दुटप्पी आणि दांभिकतेचा निषेध करावा तितका थोडाच. प्रेमाच्या साम्राज्यात स्त्री-पुरुष समान हवेत."
हे धाडसी विचार आहेत शंभर वर्षांपूर्वी जन्मलेल्या हिराबाई पेडणेकर या महिलेचे. ज्या काळात मराठी रंगभूमीवर फक्त पुरुष कलांकाराचं वर्चस्व होतं, त्या काळात हिराबाईंनी नाटक लिहियचं धाडस केलं होतं.
त्या काळात स्त्रिया रंगभूमीवर काम करत नव्हत्या, पुरुषच स्त्री पात्रं रंगवत असत, अशा काळात अनेक अडचणींचा सामना करत हिराबाईंनी आपलं नाटक रंगभूमीवर उभं केलं होतं.
मात्र हे करत असताना त्यांच्या वाट्याला उपेक्षाही तितकीच आली. त्याचं कारण होतं त्यांचं एका कलावंतिणीच्या घरात जन्माला येणं.
सावंतवाडीत 22 नोव्हेंबर 1885 रोजी, शेवन्तुबाईच्या पोटी हिराचा जन्म झाला. शेवन्तुबाई आपल्या तीन बहिणी भीमाबाई, मैनाबाई आणि जिजीबाई यांच्यासोबत सावंतवाडीला राहायच्या आणि पिढीजात गायकी करायच्या. सणासुदीला पेडणे या त्यांच्या गोव्यातील गावी जायच्या.
पुढं भीमाबाई आणि मैनाबाई उपजीविकेसाठी मुंबईला आल्या, तर शेवन्तुबाई सावंतवाडीलाच राहिल्या.
त्या देवदासी होत्या. देवदासी देवळात सेवा देत, गायन-नृत्य करत, यजमानांच्या आश्रयानं राहत. देवदासी म्हणायला देवाला अर्पण केलेली स्त्री असली, तरी तिचं शारीरिक शोषण केलं जायचं.
तर अशा समाजात जन्माला आलेली हिरा जेव्हा आठ वर्षांची होती, तेव्हा तिच्या आईचं निधन झालं. म्हणून गिरगावजवळील कांदेवाडीतील गांजावाला चाळीत राहणाऱ्या आपल्या भीमा मावशीकडं हिराला यावं लागलं.
छोट्याशा हिराची जडणघडण पुढं मुंबईत मावशीच्या सहवासात, कलावंतिणींच्या वस्तीत झाली.
सावळा रंग, बोलक्या डोळ्याची हिरा शाळेत जाऊ लागली. तिथंच तिला कविता करायचा आणि त्यांना चाली लावण्याचा छंद लागला.
हिरा शाळेत जात असली तरी ती गाण्यापासून दूर जाणार नाही, याची काळजी भीमा मावशीनं घेतली होती. कारण हेच तर त्यांच्या पोटापाण्याचं साधन होतं. त्यामुळेच सातवी पर्यंतचं शिक्षण पूर्ण झाल्यानंतरही हिराचं संगीत सुरू राहिलं.
शंकरराव धुळेकर बुवा, परशुरामबुवा बर्वे, भास्करबुवा बखले, बडोद्याचे फय्याज खान यांच्याकडून तिनं संगीताचे धडे घेतले.
खरंतर हिराला गाण्याची गोडी तिची खास वर्गमैत्रीण अंजनीमुळे लागली होती. अंजनी मालपेकरची आई नबुबाई प्रसिद्ध गायिका होती. अंजुला गाणं शिकवायला भेंडीबाजार घराण्याचे मोठे गायक नजीर खाँ घरी यायचे, तेव्हा हिरा तिथं असायची.
त्यामुळे तिच्याही मनात नकळतपणे गाण्याची आवड निर्माण झाली. शाळा संपल्यानंतर जसं गाणं सुरू होतं, तसंच तिचं लिखाणही सुरू होतं.
बंगाली, मराठी, संस्कृत, इंग्रजी या भाषांवरही तिनं प्रभुत्वं मिळवलं होतं.

Wednesday, 6 November 2024

चंगु नारायण मंदिर, भक्तपुर, नेपाल

 






















चंगु नारायण मंदिर, भक्तपुर, नेपाल

वास्तुकला में मील का पत्थर….
चंगु नारायण एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जो नेपाल के भक्तपुर जिले के में एक ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थित है जिसे चंगु या डोलगिरी के नाम से भी जाना जाता है। यह पहाड़ी काठमांडू से लगभग 7 मील पूर्व और भक्तपुर से कुछ मील उत्तर में है। यह मंदिर केवल एतिहासिक,कलात्मक और धार्मिक दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि नेपाल का प्रमुख पर्यटन स्थल भी है। काठमांडू घाटी में स्थित सात विश्व धरोहरों में से चांगुनारायण मंदिर भी एक है। यह काठमांडू घाटी में स्थित अन्य मंदिरों में से सबसे प्राचीन है। पहाड़ी के बगल में मनोहर नदी बहती है। नेपाल के सबसे पुराने मंदिरों में से एक माना जाने वाला यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और हिंदुओं द्वारा पूजनीय है। मंदिर चंपक वृक्षों के जंगल और चंगू नामक एक छोटे से गांव से घिरा हुआ था। कहा जाता है कि एक कश्मीरी राजा ने अपनी बेटी चंपक का विवाह भक्तपुर के राजकुमार से कर दिया था। मंदिर का नाम उसी के नाम पर रखा गया है। समुन्द्र तल से 1,372 से 2,191 मीटर की ऊंचाई में स्थित चांगुनारायण मंदिर नेपाल के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है। चांगुनारायण मंदिर का निर्माण 323 ईसा पूर्व लिच्छवीकाल के राजा श्री हरिदत्त वर्मा ने किया था। लिच्छवी काल में इस मंदिर का नाम डोला शिखर स्वामी था। इसके पीछे एक कारण यह था, चांगुनारायण मंदिर जिस पहाड़ी पर स्थित है. उस पहाड़ी को डोलागिरीर और`इस मंदिर के देवता को यहाँ के लोग पहाड़ी का स्वामी मानते थे। इसलिए इस मंदिर को डोला शिखर कहते थे।
भास वंशावली पुस्तक के अनुसार, डोलगिरी चंगु नारायण पहाड़ी के क्षेत्र में एक बड़ा चंपक वृक्ष था। उस स्थान पर सुदर्शन नाम का एक ब्राह्मण रहता था जो पवित्र और अनुशासित था, किंतु क्रोधी स्वभाव का था। उसके पास एक कपिला गाय थी, जो दिव्य कामधेनु के समान थी। गाय के दूध से वह विभिन्न देवताओं को बलि चढ़ाता था। यह गाय अक्सर उसी चंपक वृक्ष के नीचे बैठती थी। एक दिन, चंपक वृक्ष से एक सुंदर आदमी निकला, गाय का दूध पीया और फिर वापस पेड़ में गायब हो गया। गाय इस पेड़ पर जाती और आदमी उसका दूध पीता। सात दिनों तक अपनी गाय से दूध न मिलने के बाद, ब्राह्मण क्रोधित हो गया और सोचने लगा, "जब तक मैं उस व्यक्ति का सिर नहीं काट देता जो पवित्र प्रसाद के लिए रखे गए दूध को पीने की हिम्मत करता है, मैं चैन से नहीं बैठूंगा।" क्रोध से भरा ब्राह्मण चुपके से गाय का पीछा करने लगा और एक गुप्त स्थान से उसे देखता रहा।
जब गाय चंपक वृक्ष के नीचे पहुँची, तो वह व्यक्ति बाहर आया और उसका दूध पीने लगा। क्रोध में आकर ब्राह्मण ने अपनी तलवार खींची और उस व्यक्ति की गर्दन पर वार कर दिया। उस क्षण, वह व्यक्ति रूपांतरित हो गया और उसने स्वयं को भगवान विष्णु के रूप में प्रकट किया, जो अब अपने सिर से रहित होकर शंख, चक्र, गदा और कमल धारण किए हुए गरुड़ पर विराजमान थे। ब्राह्मण अपने किए पर पश्चाताप से भर गया, विलाप करते हुए बोला, "मैंने पिछले जन्म में ऐसा कौन सा पाप किया था, जिसकी वजह से मुझे यह सब झेलना पड़ा?"
जब ब्राह्मण पश्चाताप में अपनी जान लेने वाला था, भगवान नारायण प्रकट हुए और उसे आश्वासन दिया, "हे ऋषि, डरो मत। तुम्हें शोक करने का कोई कारण नहीं है। अपने डर को त्याग दो और वरदान मांगो।" ब्राह्मण ने उत्तर दिया, "हे नारायण, मुझे अपने चक्र से मेरा सिर काटने के पाप का दंड दो।"
इस पर भगवान नारायण ने समझाया, "हे ऋषिवर, सुनिए। बहुत समय पहले चंद्र नामक राक्षस के साथ युद्ध में मेरे द्वारा चलाए गए एक अस्त्र से उनके प्रिय मित्र सुमति नामक ब्राह्मण की मृत्यु हो गई थी। उनकी दृढ़ भक्ति के कारण उनके गुरु शुक्राचार्य ने मुझे श्राप दिया था कि भविष्य में सुमति के वंशज द्वारा मेरा सिर काटा जाएगा। यह तुम्हारे हाथों होना ही था।इस प्रकार, यह अपरिहार्य था। अब मैं यहाँ एक कटे हुए सिर के रूप में निवास करूँगा। यहाँ मेरी पूजा करो और मुझे अपनी प्रार्थनाएँ दो।"
इन शब्दों के साथ, भगवान नारायण अंतर्ध्यान हो गए।
चंगु नारायण को नेपाल का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है। समृद्ध उभरे हुए कार्यों के साथ यह नेपाली मंदिर वास्तुकला में एक मील का पत्थर बना हुआ है। दो मंजिला छत वाला मंदिर पत्थर के एक ऊंचे चबूतरे पर खड़ा है। मंदिर न तो शिखर शैली में है और न ही शिवालय शैली में। इसकी एक स्थापत्य शैली है जिसे वह पारंपरिक नेपाली मंदिर के रूप में वर्णित करना चाहेंगे । गोकर्ण महादेव में कई समान विशेषताएं पाई जाती हैं। मंदिर भगवान विष्णु से संबंधित मूर्तियों और कलाओं से घिरा हुआ है। साथ ही, हम मुख्य मंदिर के प्रांगण के अंदर भगवान शिव, अष्ट मातृका, छिन्नमस्ता, किलेश्वर और कृष्ण के मंदिर पा सकते हैं। चांगुनारायण मंदिर पैगोडा शैली में बना है। नेपाल में मंदिर निर्माण की मौलिक शैली पैगोडा शैली है। यह मंदिर लिच्छवीकालिन वास्तुकला का नमूना भी है। चांगुनारायण का मंदिर चतुष्कोण आकार का है। यह मंदिर दोमंजिला है। इस मंदिर की निचले मंजिल की छत टायलों से बनी है तथा उपले मंजिल की छत पीतल से बनी चादरों से निर्माण किया गया है।
दोनों मंजिलों में मझले आकार की खिड़कियाँ हैं। दोनों मंजिलो में 40 चौकोर आकृति बने हुए हैं प्रत्येक आकृति में तीन तरह की मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। जिसमे सबसे ऊपर पेड़ और लताएँ, मध्य भाग में मुख्य देवता (भगवान् विष्णु और भगवान् शिव की अनेक रूप) तथा सबसे नीचे मनुष्य, पशु और पक्षियों की मूर्तियाँ बनाई गई हैं। पहले मंजिल में भगवान श्री विष्णु जी का वाहन गरुड़जी की पत्थर की मूर्ति है।
मंदिर के चार प्रवेश द्वार हैं। प्रवेश द्वार पर नाग की नक्काशी की गई है। प्रत्येक मुख्य द्वार के दायें और बांये एक एक दरवाजे हैं जो नहीं खोले जाते हैं। पश्चिम का मुख्य द्वार प्रायः खुला रखा जाता है। समय-समय पर अन्य मुख्य द्वारों को भी खोला जाता है। मुख्य द्वार के दायें और बाएं गंगाजी, यमुनाजी तथा अन्य देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। द्वार के ऊपर धातु से बनी लड़ियाँ सुसज्जित हैं। इन लड़ियों में विभिन्न कलाकृतियाँ बनाई गई हैं। मंदिर के चारों तरफ विभिन्न देवीदेवताओं की काष्ठ से बनी कलात्मक मूर्तियाँ हैं। मुख्य प्रवेश द्वार (यानी पश्चिमी प्रवेश द्वार) पर, एक पत्थर के स्तंभ के शीर्ष पर चक्र, शंख, कमल और खड्ग देख सकते हैं। इन पत्थर के स्तंभों पर संस्कृत में एक शिलालेख है। यह शिलालेख नेपाल का सबसे पुराना शिलालेख माना जाता है और पत्थर के शिलालेख स्तंभ को लिच्छव राजा मानदेव ने 464 ईस्वी में बनवाया था। राजा मानदेव ने चांगुनारायण के मंदिर में स्वयं की एवं उनकी पत्नी की मूर्ति भी लगवाई थी। मंदिर निर्माण की सामग्री में धातु का कम तथा लकड़ी पत्थर और ईटों का अधिक प्रयोग किया गया है। धातु का प्रयोग केवल मुख्य द्वार लड़ियों और मंदिर के शीर्ष भाग पर नुकीला शिरा पर ही किया गया है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार (पूर्वी द्वार) से प्रांगण में प्रवेश करने के बाद दाहिनी ओर से दर्शन करने पर निम्नलिखित स्मारक स्थित है। चंगु नारायण के रास्ते में एक प्राचीन पत्थर का नल स्थित है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह लिच्छवी के समय से है।
चांगुनारायण में स्थापित मूर्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं-
वैष्णवी – दूसरी शताब्दी में स्थापित पाषाण से बनी यह मूर्ति चांगुनारायण मंदिर के पूर्व दक्षिण भाग में उत्तर की ओर मुड़ी हुई मूर्ति है।
बैकुंठ विष्णु – चांगुनारायण मंदिर के पूर्व में स्थित पश्चिम की ओर मुख है। इस मूर्ति के पंचमुख हैं। विष्णु के दाये तथा बाएं बराह और नरसिंह के मुख हैं। शेष मुख शांत मुद्रा में दीखते हैं। विष्णु के दस हाथों में विभिन्न आयुध और गले में हार है।
सूर्य – आठवीं शताब्दी में स्थापित सूर्य की मूर्ति चांगुनारायण मंदिर के भण्डार में स्थित है।
बैकुंठ विष्णु – पाषाण से निर्मित उत्तर मध्यकालीन मूर्ति चांगुनारायण मंदिर के दक्षिण की ओर स्थापित है।
जय – दशवीं शताब्दी में पाषाण से निर्मित जय की मूर्ति मंदिर की पूर्व की तरफ आँगन में स्थित है।
विजय – पत्थर से निर्मित यह मूर्ति मंदिर के पूर्व दिशा में आँगन में स्थित है और पश्चिम की और मुड़ी हुई है।
शिव – पत्थर से निर्मित आठवी शताब्दी में स्थापित शिव की मूर्ति मंदिर के भंडार में स्थित है।
श्रीधर विष्णु – सातवीं शताब्दी में पत्थर से निर्मित यह मूर्ति मंदिर के पूर्व दिशा में है।
गरुडासन विष्णु – पत्थर से निर्मित तेरहवीं शताब्दी में स्थापित यह मूर्ति मंदिर के पश्चिम में है।
पद्यमपाणी लोकेश्वर – पत्थर से निर्मित यह मूर्ति मंदिर परिसर में स्थापित है। इस मूर्ति का निर्माण आठवीं शताब्दी में किया गया था।
विष्णु विक्रांत – आठवीं शताब्दी में पत्थर से निर्मित यह मूर्ति दक्षिण पश्चिम कोने में स्थित है।
गरुड़ – सातवीं शताब्दी में पत्थर से निर्मित यह मूर्ति मंदिर के पशिम में स्थित है।
विश्वरूप – चांगुनारायण मंदिर के दक्षिण दिशा में स्थित पत्थर से निर्मित इस मूर्ति का निर्माण आठवीं शताब्दी में किया गया था।
बुद्ध – आठवीं शताब्दी में पत्थर से बनी बुद्ध की मूर्ति मंदिर के पश्चिम में स्थित है।
गरुड़ – मंदिर के पूर्व भाग में गरुड़जी की पत्थर से बनी मूर्ति है। इसकी स्थापना नवीं शताब्दी में किया गया था।
सिंहिनी – दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी में पत्थर से निर्मित यह मूर्ति ,मंदिर परिसर में स्थित है।
शिव – पत्थर से निर्मित उत्तर मध्यकालीन शिव की मूर्ति मंदिर परिसर में स्थित है।
कृष्ण – पत्थर से बनी कृष्ण की मूर्ति मंदिर परिसर में स्थित है।
हनुमान – मध्यकालीन पत्थर से निर्मित हनुमान की मूर्ति मंदिर परिसर में स्थापित है।
महाकाल – पत्थर से निर्मित महाकाल की मूर्ति मंदिर परिसर में स्थित है।
कौमारी – चांगुनारायण मंदिर पूर्व दक्षिण भाग में उत्तर की ओर मुड़ी हुई मूर्ति पत्थर से बनी हुई है तथा इसकी स्थापना दूसरी शताब्दी में किया गया था।
इस मंदिर में नाग पंचमी, कृष्ण जन्माष्टमी, हरिबोधिनी एकादशी, पूर्णिमा, तीज और नवमी आदि में विशेष रूप से पूजा अर्चन की जाती है।
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Sunday, 26 May 2024

शहीद वीरांगना रानी अवंतीबाई

 

यह शौर्य गाथा है

शहीद वीरांगना रानी अवंतीबाई की
यह भारत देश शौर्य और पराक्रम से भरा हुआ देश है। यहाँ बसने वाले वीरगाथाओं ने देश एवं विदेश में एक-एक भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा किया है। रानी कोटा से लेकर रानी लक्ष्मीबाई इन सभी वीरांगनाओं ने अपने राज्य और देश की स्वतंत्रता और गौरव के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। मगर आज के भटके भारत ने इन सभी गाथाओं को भुला दिया है। इन वीरों को वह महत्व नहीं दिया गया जिनके यह हकदार थे। ऐसे ही एक वीरांगना की अमर गाथा आप सबके सामने लाया हूँ। यह इतिहास है रानी अवंतीबाई(Rani Avantibai) की जिन्होंने अंग्रेजों को उलटे पाँव भागने पर विवश किया था।
16 अगस्त 1831 को आज के मध्य प्रदेश में रानी का जन्म हुआ। अवंतीबाई के पिता राव जुझार सिंह जिला सिवनी के जमींदार थे, जिन्होंने बचपन से अवंतीबाई को शिक्षा, घुड़सवारी एवं तलवारबाज़ी सीखने की छूट दी। यह बात इसलिए भी ख़ास है क्योंकि उस समय और आज भी कई जगह बेटियों को घर का काम ज़्यादा सिखाया जाता है। रानी अवंतीबाई के किस्से दूर-दूर तक मशहूर होने लगे थे। अवंतीबाई(Rani Avantibai) के साहस और कौशल को देखकर सभी आश्चर्यचकित रह जाते थे।
रानी अवंतीबाई का विवाह रामगढ़ रियासत के राजकुमार विक्रमादित्य सिंह से हुआ था। वर्ष 1850 में अपने पिता की मृत्यु के उपरांत राजकुमार विक्रमादित्य ने राजा का पदभार संभाला। रानी अवंतीबाई के दो पुत्र हुए जिनका नाम था अमान सिंह एवं शेर सिंह। राज-काज संभालने के कुछ समय बाद ही राजा अस्वस्थ रहने लगे। नौबत यह आन पड़ी थी कि उनसे रियासत का काम संभालना दूभर हो गया। उस समय दोनों राजकुमार भी छोटे थे जिस वजह से राज-काज कौन संभालेगा इस पर दुविधा की स्थिति पैदा हो गई थी। जिसके पश्चात रानी अवंतीबाई ने राज-काज संभालने का निर्णय लिया।
अंग्रेजी शासन अपने साम्राज्य के विस्तार में हर संभव प्रयास कर रहा था। उस समय के ब्रिटिश राज के गवर्नर जनरल थे लॉर्ड डलहौजी जिसका भारत में 'डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स' कानून के जरिए सभी हिन्दू बहुल प्रांतों को किसी भी तरह अपने साम्राज्य में शामिल करना ही मकसद था। और इसी कानून के जरिए वह कानपुर, झांसी, नागपुर, सतारा, जैतपुर, संबलपुर, उदयपुर, करौली इत्यादि रियासतों को हड़प चुका था।
जब राजा के अस्वस्थ रहने की भनक अंग्रेजी हुकूमत तक पहुंचीं, तो डलहौजी की नजर इस रियासत पर भी पड़ी। और उसने रियासत को अंग्रेजी हुकूमत के अधीन लाने का फैसला किया। जिसके उपरांत रानी अवंतीबाई(Rani Avantibai) को अयोग्य घोषित कर सत्ता को हड़प लिया गया। इसे रानी अवंतीबाई ने स्वयं के साथ-साथ स्वतंत्रता का भी अपमान समझा
सन 1857 में जब सम्पूर्ण देश में स्वतंत्रता की आग जन्मी थीं तब इस आग लपटें रानी अवंतीबाई(Rani Avantibai) तक भी पहुँची। जिसके तत्पश्चात ही उन्होंने संग्राम में कूदने का फैसला किया। रानी अवंतीबाई(Rani Avantibai) के साथ अन्य साथी रिआसतों ने भी संग्राम में कूदने का फैसला किया और यह सब रानी द्वारा लिखे गए खतों की वजह से संभव हुआ। इस समय रानी लगभग 4000 स्वतंत्रता सेनानियों का नेतृत्व कर रहीं थीं, जो कि देश और स्वतंत्रता के लिए मर-मिटने के लिए भी तैयार थे।
भारतीय वीरों ने अंग्रेजों के साथ खेरी गांव में हुए पहले झड़प में उन गोरों के दाँत खट्टे कर दिए। गोरों ने यह नहीं सोचा था कि भारतीय शेर उन पर भारी पड़ेंगे। रानी अवंतीबाई द्वारा बनाई गई रणनीति का ही यह नतीजा था कि अंग्रेजों को भागने पर मजबूर होना पड़ा और मंडला क्षेत्र रानी अवंतीबाई के अधीन आ गया।
जब इस घटना की खबर ब्रिटिश प्रशासन को लगी तो वह सब बौखला गए, किन्तु वह यह भी जानते थे कि इन भारतीय शेरों से भिड़ना आसान काम नहीं होगा। तब गोरों ने पहले से कई ज़्यादा क्रूर रणनीति बनाई। इस बार हुए झड़प में हमारे देशभक्त मशीनगनों और बर्बरता के सामने नहीं टिक पाए और अंततः रानी को जान बचाने के लिए और इस संग्राम को जीवित रखने के लिए देवीरगढ़ के जंगलों में भागना पड़ा। अंग्रेजों द्वारा देशभक्तों की हत्या की आग अभी भी रानी के सीने में धधक रही थी और रानी अवंतीबाई उन वीरांगनाओं में से थीं जिन्होंने हारना सीखा ही नहीं।
रानी अवंतीबाई ने पुनः सेना एकत्र कर अंग्रेजों के शिविर पर हमला बोला किन्तु फिर एक बार आजादी के मतवालों को मशीनगनों द्वारा रौंध दिया गया। जब रानी(Rani Avantibai) ने स्वयं को अंग्रेजों से घिरते हुए देखा तब उन्होंने बंधक के रूप में नहीं स्वतंत्र मरने का फैसला किया और अपने ही तलवार से खुद के प्राण ले लिए। ऐसे ही कई स्वतंत्रता संग्राम के बाद देश भर में आजादी की मुहीम तेज हुई थी। ऐसे ही वीर, वीरांगनाओं के बलिदानों से प्रेरित होकर शहीद भगत सिंह, आज़ाद जैसे अनेकों स्वतंत्रता सेनानियों ने देश के लिए बलिदान दिए। जिसका परिणाम है आज का 'आजाद भारत'। #rajputana #Rajput #history

Thursday, 9 May 2024

गोवा राज्यातला अलोर्ना किंवा हळर्ण किल्ला...









 गोवा राज्यातला अलोर्ना किंवा हळर्ण किल्ला...

 

गोवा राज्यातला अलोर्ना किंवा हळर्ण किल्ला...
पोर्तुगिजांना शह देण्यासाठी दुसरे फोंड सावंत यांनी हळर्ण येथे शापोरा नदीच्या काठावर भुईकोट बांधला होता. पुढे यावर पोर्तुगिजांनी वर्चस्व ठेवले. प्रामुख्याने जांभा दगडाचा बांधकामासाठी वापर केलेल्या या किल्ल्याने बरेचसे अवशेष आजही शाबूत आहेत. पोर्तुगिजांनीही पुढे त्याचे नुतनीकरण केल्याचे संदर्भ मिळतात. याला अलोर्णा किल्ला म्हणूनही संबोधले जाते. चार बुरूज, चारही बाजूनी तटबंदी, त्यावर तोफा चढवण्यासाठीचा मार्ग अशी याची रचना आहे..
● हळर्णची लढाई :
सिंधुदुर्ग सावंतवाडी संस्थानचे राजे रामचंद्र सावंत आणि त्यांचे काका जयराम सावंत महाराज यांच्या सुरवातीच्या स्वतंत्र कारभार काळात गोव्यात स्थिरावलेल्या पोर्तुगीजांची पिछेहाट झाली; मात्र पोर्तुगीजांचा गव्हर्नर बदलला आणि परिस्थितीही बदलून गेली. पोर्तुगीजांनी सावंतवाडीकरांना शह देत जोरदार 'कम बॅक' केले. यात हळर्ण येथील लढाई सावंतवाडीकरांना धक्का देणारी ठरली..
पोर्तुगीजांसाठी १७३७ ते १७४० ही दोन वर्षे नुकसानकारक ठरली होती. वसई भागात पेशव्यांनी आणि गोव्यात सावंतवाडीकरांनी त्यांचा बराचसा मुलुख ताब्यात घेतला होता. १७४४ मध्ये गोव्यात "कोंद दी अशुमर' हा नवा गव्हर्नर जनरल पोर्तुगिज सरकारने नेमला. त्याने पोर्तुगीजांचे वर्चस्व पुन्हा राखण्याच्या दृष्टीने हालचाली सुरू केल्या. हळर्ण (गोवा) येथे झालेली लढाई यात महत्त्वाची ठरली. किल्ल्यावर वर्चस्वासाठी झालेल्या या लढाईचे सविस्तर वर्णन पोर्तुगीजांच्या एका संदर्भ पत्रात आढळते. हे पत्र गव्हर्नर जनरल अशुमर यानेच आपल्या पोर्तुगाल मधील शासनकर्त्यांना पाठवले होते..
याच किल्ल्यावर नवा गव्हर्नर जनरल कोंद दी अशुमर याने पहिला हल्ला केला. याबाबत पोर्तुगीजांनी ठेवलेल्या नोंदीमधील हळर्ण किल्ल्यावरील लढाईचे वर्णन खूप रोचक आहे. ५ मे १७४६ ला पोर्तुगीजांनी लढाई करून सावंतवाडी करांकडून हा किल्ला हस्तगत केला. पोर्तुगीजांनी हल्ल्या साठी हळर्ण किल्लाच पहिल्यांदा का निवडला याचीही कारणे होती. कोलवाळच्या किल्ल्याजवळून वाहणाऱ्या शापोरा नदीच्या किनाऱ्यावरच हा किल्ला आहे. तिथे याला पोरोकाव नदी असेही म्हणायचे. सावंतवाडीकरांचा हा या भागातील सगळ्यात मजबूत किल्ला होता. तो मिळवला तर रेडी आणि डिचोली किल्ल्यावर हल्ला करणे सोपे जाणार होते, पण तो मिळवण इतक सोप नव्हत. यात मुख्य अडचण होती ती दुर्गमतेची. या किल्ल्याजवळ दारूगोळा नेण्याचे आव्हान होते. त्यासाठी गाड्या, ओझी वाहणारे बैल मिळणे मुश्कील होते. त्यामुळे माणसांनी हे साहित्य नेणे हाच पर्याय होता. इतके मनुष्यबळ मिळणेही कठीण होते. अशा स्थितीतही गव्हर्नर जनरल अशुमर याने हल्ल्याचा नियोजित आराखडा बनवला. त्याने सैन्याची दोन टप्प्यात विभागणी केली. आधी जमिनी वरील सैन्याचा अधिकारी पेटीपॉटल यांच्या नेतृत्वाखाली एक तुकडी हळर्णनकडे नेण्याचा आदेश दिला..
पूर्व हळर्णला वेढा घालून थांबण्यापेक्षा पोर्तुगिजांनी एकदम हल्ला करून किल्ल्यापर्यंत मजल मारण्याची रणनिती आखली व ते त्यात यशस्वी झाले. पुढे किल्ला मिळवण्यासाठी खटाटोप सुरू झाला. ५ मे १७४६ ला पहाटे तीन वाजता पोर्तुगिज सैन्याने किल्ल्यावर एकदम हल्ला चढवला. किल्ल्याच्या पहिल्या मोठ्या प्रवेशद्वारावर एक कुलपी गोळा ठेवून तो दरवाजा उडवून दिला, मात्र सावंतवाडीकरांच्या किल्लेदाराने जोरदार प्रतिकार केला. यात पोर्तुगिज सैन्याचे बरेच नुकसान झाले. अनेक सैनिक घायाळ झाले. मृत्यू झालेल्यांची संख्याही मोठी होती. यात पेरीपॉटल हाही जखमी झाला मात्र त्याने शौर्य दाखवत आपल्या सैन्याला उत्तेजन दिले. आत आणखी दोन दरवाजे होते. ते पार करणे कठीण बनले..
शेवटी पोर्तुगिज सैन्याने तटबंदिला शिड्या लावून वर चढत आणि खालून हल्ला सुरूच ठेवला. हा हल्ला तसाच काही काळ चालल्यानंतर किल्लेदाराला शरण यायला सांगण्यात आले पण त्याने याला नकार देत पोर्तुगीजांना धुळ चारण्याचा इशारा दिला. यामुळे उरले सुरले पोर्तुगिज सैन्य आणखी निकराने लढू लागले. आतील दरवाजावर हल्ला सुरू केला. सैनिक तटावर चढू लागले पण बळकट तटबंदीमुळे हे सैनिक खाली कोसळू लागले. यात पोर्तुगीजांचे आणखी नुकसान झाले. किल्लेदाराच्या प्रतिहल्ल्यात पोर्तुगीजांची मोठी कत्तल झाली. कित्येक अंमलदार मृत्यूमुखी पडले. यातच हळर्ण किल्ल्याचे बुरूज दारूगोळ्याच्या मोठ्या साठ्याने भरल्याची अफवा पोर्तुगिज सैन्यात पसरली. ते घाबरून पळू लागले; मात्र यावेळी पोर्तुगिज सैन्य अधिकारी सार्जंट मेजर पेट्रो व्हिसेंत याने मोठा पराक्रम दाखवत युद्धाचे चित्रच पालटले. आतील दरवाजाच्या समोर लागलेल्या आगीतून वाट काढत त्या दरवाजाखा ली कुलपी गोळा ठेवला आणि दरवाजा उडवून दिला. यामुळे पोर्तुगीज सैन्याला किल्ल्यात घुसायला मार्ग मोकळा झाला..
दोन्ही सैन्य एकमेकांना भिडली. यात पोर्तुगीजांची सरशी झाली मात्र युद्ध इथे संपले नाही. आत त्याहून मजबूत दरवाजा होता. तोही कुलपी गोळ्याने उडवण्यात आला. किल्लेदार, किल्ल्यावरचे लोक, अंमलदार यांना पोर्तुगिज सैन्याने अक्षरशः कापून काढले. यावेळी या सैन्याने क्रूरतेची परिसीमा गाठल्याचा उल्लेख पोर्तुगीजांनीच आपल्या पत्रात केला आहे. ही लढाई पाच तास चालली. पोर्तुगिज शिपायांनीच या किल्ल्याला 'सान्ता क्रूझ दी अलर्न' असे नाव दिले. विजयाचे प्रतिक म्हणून समोर एक क्रूझ उभा केला. पुढे किल्ल्याची दुरूस्ती करून याचा किल्लेदार म्हणून जुजे लोपेस याला नेमण्यात आले..
या मोठ्या विजयामुळे पोर्तुगिज सरकारने गव्हर्नर जनरलला 'मार्क्किस दी अलर्न' हा किताब दिला. पुढे त्याने तेरेखोल, निवती हे किल्लेही सावंतवाडीकरांकडून जिंकले. २६ ऑक्टोबर १७४६ ला डिचोली आणि साखळी या प्रांताच्या देसाईंनी पोर्तुगीजांचे मांडलीकत्व पत्करले. पोर्तुगीजांनी त्यांना सावंतवाडीकरांकडून मिळत असलेले हक्क अबाधित ठेवण्याबरोबरच त्यांचे पूर्वीचे गमावलेले हक्कही प्रदान केले. शिवाय त्यांना आठशे शिपायांची फौज बाळगायला परवानगी दिली..
साभार : शिवप्रसाद देसाई.
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📷 दिग्विजय सिंग 👌🏼♥️🔥

Tuesday, 2 April 2024

किल्ले ग्वाल्हेर ( मध्य प्रदेश )

 

किल्ले ग्वाल्हेर ( मध्य प्रदेश ) 











लेखन :सौरभ महाडिक

 
ग्वाल्हेर किल्ला हा ग्वाल्हेर शहराच्या मध्यभागी स्थित सर्वात सुंदर ऐतिहासिक आणि वास्तुशिल्पीय आश्चर्यांपैकी एक आहे. भारतातील किल्ल्यांमधील मोती म्हणून ओळखला जाणारा ग्वाल्हेरचा किल्ला हा भारतातील सर्वोत्तम ऐतिहासिक किल्ल्यांपैकी एक आहे आणि ग्वाल्हेरमध्ये भेट देण्याच्या सर्वोच्च ठिकाणांपैकी एक आहे.
हा किल्ला ८ व्या शतकात स्थानिक राजा सूरज सेन याने गोपाचल नावाच्या एका निर्जन खडकाळ टेकडीवर बांधला होता. पौराणिक कथेनुसार, ग्वालिपा नावाच्या ऋषीने राजाला कुष्ठरोग बरा झाला, जेव्हा त्याला आता किल्ल्याच्या आत असलेल्या सूरज कुंडातून पाणी दिले. आणि राजाने त्या ठिकाणी एक किल्ला बांधला आणि त्याचे नाव ऋषींच्या नावावर " ग्वाल्हेर "असे ठेवले. तेव्हापासून तोमर, मुघल, मराठा आणि ब्रिटिशांसह अनेक राजघराण्यांनी येथे राज्य केले. सरते शेवटी, ग्वाल्हेरचा किल्ला १८८६ मध्ये सिंधियांनी ताब्यात घेतला आणि १९४७ मध्ये भारताच्या स्वातंत्र्यापर्यंत राज्य केले. येथेच तात्या टोपे आणि राणी झाशी लक्ष्मीबाई यांनी स्वातंत्र्यासाठी लढा दिला होता.
३किमी परिसरात पसरलेला, ग्वाल्हेर किल्ला हा भारतातील सर्वात मोठ्या किल्ल्यांपैकी एक आणि मध्य प्रदेशातील सर्वोच्च हेरिटेज ठिकाणांपैकी एक आहे. या ठिकाणाचे महत्त्व अजरामर करण्यासाठी भारतीय टपाल सेवेकडून टपाल तिकीट जारी करण्यात आले आहे. वाळूच्या काँक्रीटच्या भिंतींनी वेढलेल्या ग्वाल्हेर किल्ल्यामध्ये तीन मंदिरे, ६ राजवाडे आणि अनेक पाण्याची टाकी आहेत. किल्ल्याला दोन दरवाजे आहेत; मुख्य प्रवेशद्वार सुशोभित एलिफंट गेट आहे आणि दुसरे बादलगड गेट आहे. मान मंदिर, गुजरी महल संग्रहालय, तेली-का-मंदिर आणि सास बहू मंदिर ही किल्ले संकुलातील प्रमुख आकर्षणे आहेत.
मान मंदिर पॅलेस हा किल्ल्याच्या ईशान्य टोकाला असलेल्या भव्य वाड्यांपैकी एक आहे. हे मानसिंग तोमर यांनी १४८६ ते १५१६ च्या दरम्यान बांधले होते. हा राजवाडा हिंदू आणि मुघल स्थापत्यकलेचा मिलाफ दाखवतो. किचकट डिझाइन केलेल्या टाइल्स राजवाड्याच्या बाहेरील भागाला शोभतात. या राजवाड्याचे महत्त्वाचे ठिकाण जौहर तलाव आहे, जिथे राजपूत स्त्रिया सती जात असत. आतील भाग मानवी आकृती, प्राणी, फुले आणि चकचकीत टाइल्सच्या सुंदर रंगीबेरंगी चित्रांनी सजवलेले आहे. याच ठिकाणी औरंगजेबाने त्याचा भाऊ मुराद याला कैद केले आणि अफूचे (औषध) वापर करून हळूहळू विष देऊन त्याची हत्या केली.
गुजरी महल १५ व्या शतकात राजा मानसिंग तोमर यांनी त्यांची पत्नी मृगनयनी या गुजरी राजकुमारीसाठी बांधला होता. आता या वाड्याचे पुरातत्व संग्रहालयात रूपांतर करण्यात आले आहे. त्यात पुतळे, शस्त्रे, दगडी वस्तू आणि कांस्य पुरातन वस्तू आहेत. ग्यारसपूर शलभांजिका शिल्प आणि भारतीय मोनालिसाचा पुतळा हे संग्रहालयाचे मुख्य आकर्षण आहे. करण पॅलेस, जहांगीर महाल आणि शाहजहान महाल हे किल्ले संकुलातील इतर राजवाडे पाहण्यासारखे आहेत....!
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Wednesday, 6 March 2024

कर्नाटक राज्यातील गोकर्ण जवळील उत्तर कन्नडाचा 'मिर्जान किल्ला’...

 


कर्नाटक राज्यातील गोकर्ण जवळील उत्तर कन्नडाचा 'मिर्जान किल्ला’...
मिर्जान या किल्ल्याचे प्रथम ऐतिहासिक दृष्टान्तात नवेथ एस्पर इब्नबट्टाुता यांनी बांधलेल्या या किल्ल्याची निर्मिती प्रथम १२०० च्या सुमारास नवाथ सल्तनतने केली होती... त्यानंतर ते विजयनगर साम्राज्याखाली आले त्यानंतर १६०८ मध्ये भारताच्या पुरातत्त्व सर्वेक्षण ताड्री क्रीकच्या दक्षिण-पूर्व किनारपट्टीवर १६०८-१६४० च्या कालखंडापर्यंत त्याचे बांधकाम केले...
आणखी एक गोष्ट अशी की कि किल्ला विजयनगर साम्राज्याच्या शासकांच्या नेतृत्वाखाली होता... या साम्राज्याच्या पश्चात झाल्यानंतर विजापूर सुल्तानांनी किल्ले जिंकले आणि गोवाचे तत्कालीन राज्यपाल शरिफ-उल-मुल्क यांना किल्ल्याचे बांधकाम किंवा नूतनीकरण करण्याचे श्रेय दिले जाते...
मिर्जान त्यांच्या राजवाड्याचे स्थान होते १७ व्या शतकात कैलडी राजवंशाने स्वतंत्र राजवटीचा दर्जा दिला आणि त्यानंतर मिरजानच्या दक्षिणेस कन्नराचा प्रदेश, त्याच्या राजधानीने बेडनुर येथे राज्य केले. १६७६ मध्ये कैलडी रान चिन्नमम यांनी मिर्जेनपर्यंत हा प्रदेश ताब्यात घेतला होता...
१७५७ मध्ये, मराठ्यांनी मिर्झन किल्ला जप्त केला होता १७५५ मध्ये बेदनूरचा शेवटचा शासक बासप्पा नाईक याच्या मृत्यूनंतर हा किल्ला पकडला गेला.. या घटनेमुळे त्याच्या १७ वर्षांच्या दत्तक पुत्र चाणबासावीय यांचे प्रतिनिधीत्व झाले तिच्या दत्तक मुलाला तिच्या “जार” घेण्याचा विरोध केल्यामुळे तिने त्याला खून केले यामुळे संतप्त स्थानिक लोकांनी बंड केला आणि मराठ्यांनी किल्ला जिंकून घेतला त्या परिस्थितीचा फायदा घेत होता....
मे १७८३ ते मार्च १७८४ दरम्यान ब्रिटिशांनी मेजर तोररिओनच्या नेतृत्वाखाली हा किल्ला ताब्यात घेण्यापूर्वी होणपती पर्यंत नेले होते....
डे बॅरोस, बारबोसा, हैमिल्टन आणि बुकानन यासारख्या इतिहासातील क्रोनिकर यांनी मेगनच्या नावाखाली विजयनगर राजांच्या अधिपत्याखाली किल्ल्याचा इतिहास नोंदवला आहे १७२० मध्ये हॅमिल्टन एक लहान पोर्ट म्हणून त्याचे महत्त्व दर्शवितो ज्याचा वापर मिरपूड, कॅसिया, खनिज पदार्थ आणि जंगली जायफळ यांच्या निर्यातीसाठी केला जातो. १८०१ मध्ये बुकानन यांनी ‘मिडिझॉय’ हे ठिकाण ‘मिडीजॉय’ म्हटले...
📷✍🏽 @sachinpokharkar_

हिराबाई पेडणेकर:

  हिराबाई पेडणेकर: मराठीतल्या पहिल्या महिला नाटककार, ज्यांची नाटकं केवळ 'कलावंतिणीचं घराणं' म्हणून नाकारली "पुरुषानेही स्त्रीवर...