Monday, 31 July 2023

राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास...

 अकबर के नौरत्नों की चर्चा है ,पर महाराजा विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई नहीं है!

अकबर ने महान महाराजा विक्रमादित्य की तर्ज पर नौ रत्न रखे थे।


राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों को जानने का प्रयास.......

राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका देश विदेश में बजता था।

ये हैं नवरत्न...

1. धन्वन्तरि: नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।

2. क्षपणक: जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे। इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते थे।

इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।

3 अमरसिंह: ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रन्थों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान् पण्डित बन जाता है।

4. शंकु: इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान् माना गया है।

5. वेतालभट्ट: विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।

6. घटखर्पर: जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया।

इनकी रचना का नाम भी ‘घटखर्पर काव्यम्’ ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है। इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।

7. कालिदास: ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रन्थों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है। कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था किन्तु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया।

जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और तीन नाटक प्रसिद्ध हैं। शकुन्तला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।

8. वराहमिहिर: भारतीय ज्योतिष शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें; ‘बृहज्जातक‘, सुर्यसिद्धांत, ‘बृहस्पति संहिता’, ‘पंचसिद्धान्ती’ मुख्य हैं। गणक तरंगिणी’, ‘लघु-जातक’, ‘समास संहिता’, ‘विवाह पटल’, ‘योग यात्रा’, आदि आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।

9. वररुचि: कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।

इनके नाम पर मतभेद है। क्योंकि इस नाम के तीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से...

1.पाणिनीय व्याकरण के वार्तिककार: वररुचि कात्यायन,
2.‘प्राकृत प्रकाश के प्रणेता: वररुचि
3.सूक्ति ग्रन्थों में प्राप्त कवि: वररुचि

सिन्धु घाटी की लिपि

 


सिन्धु घाटी की लिपि
इतिहासकार अर्नाल्ड जे टायनबी ने कहा था कि, विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़ छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है।
भारतीय इतिहास का प्रारम्भ तथाकथित रूप से सिन्धु घाटी की सभ्यता से होता है, इसे हड़प्पा कालीन सभ्यता या सारस्वत सभ्यता भी कहा जाता है। बताया जाता है, कि वर्तमान सिन्धु नदी के तटों पर 3500 BC (ईसा पूर्व) में एक विशाल नगरीय सभ्यता विद्यमान थी। मोहनजोदारो, हड़प्पा, कालीबंगा, लोथल आदि इस सभ्यता के नगर थे।
पहले इस सभ्यता का विस्तार सिंध, पंजाब, राजस्थान और गुजरात आदि बताया जाता था, किन्तु अब इसका विस्तार समूचा भारत, तमिलनाडु से वैशाली बिहार तक, आज का पूरा पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान तथा (पारस) ईरान का हिस्सा तक पाया जाता है। अब इसका समय 7000 BC से भी प्राचीन पाया गया है।
इस प्राचीन सभ्यता की सीलों, टेबलेट्स और बर्तनों पर जो लिखावट पाई जाती है उसे सिन्धु घाटी की लिपि कहा जाता है। इतिहासकारों का दावा है, कि यह लिपि अभी तक अज्ञात है, और पढ़ी नहीं जा सकी। जबकि सिन्धु घाटी की लिपि से समकक्ष और तथाकथित प्राचीन सभी लिपियां जैसे इजिप्ट, चीनी, फोनेशियाई, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई आदि सब पढ़ ली गयी हैं।
आजकल कम्प्यूटरों की सहायता से अक्षरों की आवृत्ति का विश्लेषण कर मार्कोव विधि से प्राचीन भाषा को पढना सरल हो गया है।
सिन्धु घाटी की लिपि को जानबूझ कर नहीं पढ़ा गया और न ही इसको पढने के सार्थक प्रयास किये गए। भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद (Indian Council of Historical Research) जिस पर पहले अंग्रेजो और फिर नकारात्मकता से ग्रस्त स्वयं सिद्ध इतिहासकारों का कब्ज़ा रहा, ने सिन्धु घाटी की लिपि को पढने की कोई भी विशेष योजना नहीं चलायी।
क्या था सिन्धु घाटी की लिपि में? अंग्रेज और स्वयं सिद्ध इतिहासकार क्यों नहीं चाहते थे, कि सिन्धु घाटी की लिपि को पढ़ा जाए?
अंग्रेज और स्वयं सिद्ध इतिहासकारों की नज़रों में सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्नलिखित खतरे थे...
1. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने के बाद उसकी प्राचीनता और अधिक पुरानी सिद्ध हो जायेगी। इजिप्ट, चीनी, रोमन, ग्रीक, आर्मेनिक, सुमेरियाई, मेसोपोटामियाई से भी पुरानी. जिससे पता चलेगा, कि यह विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है। भारत का महत्व बढेगा जो अंग्रेज और उन इतिहासकारों को बर्दाश्त नहीं होगा।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को पढने से अगर वह वैदिक सभ्यता साबित हो गयी तो अंग्रेजो और स्वयं सिद्ध द्वारा फैलाये गए आर्य द्रविड़ युद्ध वाले प्रोपगंडा के ध्वस्त हो जाने का डर है।
3. अंग्रेज और स्वयं सिद्ध इतिहासकारों द्वारा दुष्प्रचारित ‘आर्य बाहर से आई हुई आक्रमणकारी जाति है और इसने यहाँ के मूल निवासियों अर्थात सिन्धु घाटी के लोगों को मार डाला व भगा दिया और उनकी महान सभ्यता नष्ट कर दी। वे लोग ही जंगलों में छुप गए, दक्षिण भारतीय (द्रविड़) बन गए, शूद्र व आदिवासी बन गए’, आदि आदि गलत साबित हो जायेगा।
कुछ इतिहासकार सिन्धु घाटी की लिपि को सुमेरियन भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे तो कुछ इजिप्शियन भाषा से, कुछ चीनी भाषा से, कुछ इनको मुंडा आदिवासियों की भाषा, और तो और, कुछ इनको ईस्टर द्वीप के आदिवासियों की भाषा से जोड़ कर पढने का प्रयास करते रहे। ये सारे प्रयास असफल साबित हुए।
सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में निम्लिखित समस्याए बताई जाती है...
सभी लिपियों में अक्षर कम होते है, जैसे अंग्रेजी में 26, देवनागरी में 52 आदि, मगर सिन्धु घाटी की लिपि में लगभग 400 अक्षर चिन्ह हैं। सिन्धु घाटी की लिपि को पढने में यह कठिनाई आती है, कि इसका काल 7000 BC से 1500 BC तक का है, जिसमे लिपि में अनेक परिवर्तन हुए साथ ही लिपि में स्टाइलिश वेरिएशन बहुत पाया जाता है। ये निष्कर्ष लोथल और कालीबंगा में सिन्धु घाटी व हड़प्पा कालीन अनेक पुरातात्विक साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद निकला।
भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक लिपि है जिसे ब्राह्मी लिपि कहा जाता है। इस लिपि से ही भारत की अन्य भाषाओँ की लिपियां बनी। यह लिपि वैदिक काल से गुप्त काल तक उत्तर पश्चिमी भारत में उपयोग की जाती थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत के अनेक ग्रन्थ ब्राह्मी लिपि में प्राप्त होते है।
सम्राट अशोक ने अपने धम्म का प्रचार प्रसार करने के लिए ब्राह्मी लिपि को अपनाया। सम्राट अशोक के स्तम्भ और शिलालेख ब्राह्मी लिपि में संस्कृत आदि भाषाओं में लिखे गए और भारत में लगाये गए।
सिन्धु घाटी की लिपि और ब्राह्मी लिपि में अनेक आश्चर्यजनक समानताएं है। साथ ही ब्राह्मी और तमिल लिपि का भी पारस्परिक सम्बन्ध है। इस आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि को पढने का सार्थक प्रयास सुभाष काक और इरावाथम महादेवन ने किया।
सुभाष काक ने तो बहुत शोध पत्र तैयार किया एवम सिंधु घाटी की लिपि को लगभग हल कर लिया था, परंतु प्रकाशित करने के एक दिन पहले रहस्यमय मृत्यु हो गई। ये भी शास्त्री जी वाली कहानी थी।
सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 400 अक्षर के बारे में यह माना जाता है, कि इनमे कुछ वर्णमाला (स्वर व्यंजन मात्रा संख्या), कुछ यौगिक अक्षर और शेष चित्रलिपि हैं। अर्थात यह भाषा अक्षर और चित्रलिपि का संकलन समूह है। विश्व में कोई भी भाषा इतनी सशक्त और समृद्ध नहीं जितनी सिन्धु घाटी की भाषा।
बाएं लिखी जाती है, उसी प्रकार ब्राह्मी लिपि भी दाएं से बाएं लिखी जाती है। सिन्धु घाटी की लिपि के लगभग 3000 टेक्स्ट प्राप्त हैं।
इनमे वैसे तो 400 अक्षर चिन्ह हैं, लेकिन 39 अक्षरों का प्रयोग 80 प्रतिशत बार हुआ है। और ब्राह्मी लिपि में 45 अक्षर है। अब हम इन 39 अक्षरों को ब्राह्मी लिपि के 45 अक्षरों के साथ समानता के आधार पर मैपिंग कर सकते हैं और उनकी ध्वनि पता लगा सकते हैं।
ब्राह्मी लिपि के आधार पर सिन्धु घाटी की लिपि पढने पर सभी संस्कृत के शब्द आते है जैसे; श्री, अगस्त्य, मृग, हस्ती, वरुण, क्षमा, कामदेव, महादेव, कामधेनु, मूषिका, पग, पंच मशक, पितृ, अग्नि, सिन्धु, पुरम, गृह, यज्ञ, इंद्र, मित्र आदि।
निष्कर्ष यह है कि...
1. सिन्धु घाटी की लिपि ब्राह्मी लिपि की पूर्वज लिपि है।
2. सिन्धु घाटी की लिपि को ब्राह्मी के आधार पर पढ़ा जा सकता है।
3. उस काल में संस्कृत भाषा थी जिसे सिन्धु घाटी की लिपि में लिखा गया था।
4. सिन्धु घाटी के लोग वैदिक धर्म और संस्कृति मानते थे।
5. वैदिक धर्म अत्यंत प्राचीन है।
वैदिक सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन व मूल सभ्यता है, यहां के लोगों का मूल निवास सप्त सैन्धव प्रदेश (सिन्धु सरस्वती क्षेत्र) था जिसका विस्तार ईरान से सम्पूर्ण भारत देश था।वैदिक धर्म को मानने वाले कहीं बाहर से नहीं आये थे और न ही वे आक्रमणकारी थे। आर्य द्रविड़ जैसी कोई भी दो पृथक जातियाँ नहीं थीं जिनमे परस्पर युद्ध हुआ हो।

कपिलेश्वर मंदिर निंब मुडावद

 

कपिलेश्वर मंदिर निंब मुडावद 










जळगाव व धुळे जिल्ह्याच्या, तसेच अमळनेर, शिंदखेडा व शिरपूर या तीन तालुक्याच्या सीमारेषेवर असलेले पवित्र तीर्थक्षेत्र म्हणजे कपिलेश्वर महादेव मंदिर ! तापी पांझरा व गुप्त कपिलगंगा यांच्या त्रिवेणी संगमावर असल्याने येथील स्थानमहात्म्यास अनन्यसाधारण महत्व आहे. स्कंध पुराणात उल्लेख असलेल्या भारतातील प्रमुख १०८ शिवमंदिरामध्ये श्री क्षेत्र कपिलेश्वर महादेव मंदिराचा समावेश होतो. स्कंदपुराण व तापी महात्म्य या ग्रंथांमध्ये श्री क्षेत्र कपिलेश्वर मंदिराची महती गायली आहे.
प्राचीन ग्रंथात कपिल मुनी यांचा उल्लेख आढळतो. कर्दम ऋषींचे पुत्र कपिल मुनी हे सांख्यशास्त्राचे जनक मानले जातात. उपनिषद ग्रंथात वर्णन केलेल्या सिद्धांताचे यांनीच प्रथम विवेचन केले व सांख्यशास्त्राला प्रतिष्ठा प्राप्त करून दिली. अशा महाविद्वान ऋषींचे वास्तव्य काही काळ या ठिकाणी होते. त्यांच्या वास्तव्याच्या कालखंडात त्यांनी शंकराची उपासना केली. शिवाने अंशरुपाने येथे स्थानापन्न व्हावे म्हणून त्यांनी शंकराला गळ घातली. कपिल ऋषींनी याच जागेवर त्रिपिंडी महादेवाची प्रतिष्ठापना केली. कपिल मुनींच्या विनंतीला मान देऊन शिवशंकर या ठिकाणी अंशरूपाने विराजमान झाले.
स्कंधपुराणात कपिलेश्वर महात्म्य यात वर्णन केले आहे की सूर्यजा (तापी) पांझरा संगमी पाताळबिळात कपिल मुनींच्या भक्तीने शिवप्रकट झाले व गुप्तगंगेचा प्रवाह पाताळबिळातून निर्माण झाला. येथील लिंग स्वयमेव असून केवळ दर्शन व स्पर्शाने स्वर्गगमनाचे द्वार खुले होते. येथील संगम स्नानास अलौकिक महत्त्व असून कपिल मुनींसमवेत कित्येक तपस्वी, संत, महंतांनी येथे तपसाधना केल्याने परिसराचे पावित्र्य कित्येक पटींनी वाढले आहे.
कपिलमुनींच्या समवेत असलेल्या असंख्य मुनींनी, विद्वानांनी या जागेवर तप, यज्ञकर्म, आराधना करून शिवस्तुती गायली. नामसाधना करीत असता या क्षेत्री कपिला गाय देखील अवतरत असे. कपिल मुनींच्या हस्ते स्थापन झालेल्या या त्रिपिंडी महादेव मंदिरास कालांतराने श्री क्षेत्र कपिलेश्वर महादेव म्हणून प्रसिद्धी मिळाली. तापी व पांजरा तसेच गुप्त कपिलगंगा यांच्या त्रिवेणी संगमावर असल्याकारणाने येथील स्थान महात्म्यास विशेष महत्त्व प्राप्त झाले आहे. या क्षेत्रावर मनोभावे शिवाची आराधना केल्यास मनोवांच्छित फळप्राप्ती होते असा भाविकांचा अनुभव आहे.
अकराव्या शतकात येथे भव्य मंदिर उभारण्यात आले होते. छत्रपती राजाराम महाराज यांच्या कालखंडापासून मराठ्यांच्या उत्तरेत मोहिमा सुरू झाल्या. माळव्यात प्रवेश करण्यासाठी दक्षिणेतून जे अनेक मार्ग होते त्यापैकी एक मार्ग येथूनच थाळनेरकडे जात होता. तापीला या ठिकाणी योग्य उतार असल्याने हा मार्ग सोयीस्कर होता. सन १६९७ मध्ये सरदार नेमाजी शिंदे यांनी सुरत - बुरहानपुर या मार्गावर असलेला थाळनेर किल्ला ८००० घोडेस्वारांशी लुटला. त्यांनी मोगल सरदार हुसेन अली खान याचा पराभव करून सुमारे एक लाख ८० हजार रुपयांची लूट मिळवली. यावरून थाळनेर किल्ला किती वैभव संपन्न होत आहे लक्षात येते.
उत्तर मराठे शाहीच्या कालखंडात थाळनेर हा सरंजाम सन १७५० मध्ये होळकरांना मिळाला. पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकरांनी सन१७८३ मध्ये कपिलेश्वर मंदिराचा जिर्णोद्धार केला. त्यासाठी वापरण्यात आलेला लालबकाम हा पाषाण या परिसरात आढळत नाही. तो नर्मदा तीरावरून आणला असावा.
सरदार नारो दादाजी नेवाळकर यांनी सन १७६६ मध्ये या ठिकाणी तापी नदीला घाट बांधला व दीपमाळ उभारली. या आशयाचा एक शिलालेख घाट उतरताना दीपमाळेच्या पायथ्याशी आढळतो. या दीपमाळेची रचना टेहळणी बुरूजासारखी केलेली आहे. वर चढण्यासाठी आतून गोलाकार दगडी पायऱ्या आहेत. दीपमाळेची उंची ८० फुटांच्या आसपास असावी. वरच्या टोकावर दोन माणसे आरामशीर बसू शकतील एवढी जागा आहे. येथून तापीचे विस्तृत पात्र, तर पलीकडे असलेला थाळनेर परगण्याचा मुलुख दिसू शकतो. शत्रूंच्या हालचालीवर लक्ष ठेवण्यासाठी याचा उपयोग होत असावा. हे निश्चित ! तसेच तापी पार करताना योग्य दिशानिर्देश देण्यासाठी देखील या दीपमाळेचा उपयोग होत असावा.
या दीपमाळेचे बांधकाम संपूर्ण दगडात केलेले आहे. दीपमाळेची उभारणी दगडी चौथ्यावर केलेली आहे. दीपमाळेच्या पाठीमागे पाच दगडी चौरंग उभारण्यात आलेले आहे. पूर्वेकडून येणाऱ्या तापीमातेचे विलोभनीय दर्शन येथून होते. या दगडी चौरंगांवरून विशेष प्रसंगी तापीमातेची आरती केली जात असावी. पश्चिमवाहिनी तापीच्या तीव्र प्रवाहापासून मंदिराचे संरक्षण व्हावे म्हणून सरदार नेवाळकरांनी मजबूत घाटाचे बांधकाम केले आहे. मंदिरापासून नदीपात्रापर्यंत उतरण्यासाठी दगडी पायऱ्या बांधलेल्या आहेत. सन २०१६/१७ मध्ये या घाटाचा जिर्णोद्धार महामंडलेश्वर हंसानंदतीर्थ महाराज यांनी पंचक्रोशीत झोळी फिरवून केला.
कपिलेश्वर मंदिराची रचना वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. पाहता क्षणीच प्रेमात पडावे असे विलोभनीय नक्षीकाम केलेले आहे.आपण वाचत आहात संजीव बावसकर लिखित पोस्ट. मंदिर पूर्वाभिमुख आहे. सभागृहात प्रवेश करण्यासाठी तीन बाजूने प्रवेशद्वार आहे. मुख्य प्रवेशद्वारासमोर नंदी विराजमान आहे. तिन्ही प्रवेशद्वारांचे कळस वैशिष्ट्यपूर्ण आहेत. पूर्वद्वारावरील आमलक पिळदार रेषायुक्त असून मोदकाच्या आकाराचा आहे, तर दक्षिणेकडील आमलक उमलत्या कमळपुष्पासारखा आहे. आमलकाच्या पायथ्याशी असलेली सज्जातटबंदी संपूर्णपणे राजस्थानी शैलीतील आहे.
मुख्य सभागृहावरील असलेले शिखर पसरट गोलाकार असून त्याची गोलाई नजरेत भरण्यासारखी आहे. त्यात कमालीची प्रमाणबद्धता आहे. सभामंडप १८ दगडी खांबांवर भक्कमपणे तोलून धरला आहे. सकाळी सूर्यकिरणांचा पहिला अभिषेक गर्भगृहातील त्रिपिंडी महादेवाला होतो. हा विलक्षण अनुभव काही काळ भक्तांना अनुभवता येतो.
मंदिराच्या पूर्वेकडील गणेशपट्टीवर एक शिलालेख कोरलेला आहे. तो शुद्ध मराठी भाषेत आहे. या शिलालेखात मंदिर जीर्णोद्धार प्रारंभ व समाप्तीचे दिनांक दिलेले आहे.
गर्भगृहाचे शिखर नागरशैलीतील आहे. चौकोनी आकारातील शिखर वरच्या दिशेने निमुळते होत गेले आहे. मुख्य शिखराला संलग्न असलेली चार मोठी व चार लहान अशी आठ उपशिखरे जोडलेली आहेत. त्यामुळे शिखराचा भारदस्तपणा डोळ्यात भरतो. शिखराच्या चारही बाजूंनी ध्यानस्थ भावमुद्रेतील यतीमूर्ती साधनेत मग्न आहेत. शिखरावरील गवाक्ष, त्यावरील अप्सरा, त्यांचा वरच्या बाजूला डरकाळी फोडणाऱ्या सिंहाकृती, अभयमुद्रा दर्शवतात. शिखरावर चढत जाणारी कलशांची उतरंड, त्यातील आम्रपल्लव, आम्रपल्लवातून आरपार केलेले नाजुक कोरीव काम, अद्भुत आहे. शिखरावरील आमलक व कलश चार ललनांनी लीलया तोलून धरला आहे. आमलक पाहताना ओरिसातील मंदिरांची आठवण येते.
कपिलेश्वर मंदिराचे गर्भगृह काळ्या तुकतुकीत पाषाणातून घडवले आहे. तर सभागृहासाठी लालबकाम वापरला आहे. त्यात असलेले पांढरे पाषाण ठिपके सर्वत्र गोपीचंद विखुरल्यासारखे वाटतात.
अंतराळ बरेच प्रशस्त असून दोन्ही बाजूंना दोन देवकोष्टके आहेत. त्यात एकही मूर्ती नसली तरी डाव्या बाजूच्या देवकोष्टकावर सोंडेत कलशधारी हत्तीचे शिल्प आहे. त्याखाली अर्धपद्मासनात बसलेली लक्ष्मी की पार्वती....? कळण्यास मार्ग नाही. तर उजवीकडच्या देवकोष्टकावर दोन गज शिल्पांच्या मध्ये पूर्ण पद्मासनात ध्यानस्थ बसलेली शिवमूर्ती असावी. या मूर्तीला फक्त दोन हात दाखवलेले आहेत. मंदिराचे अंतराळ प्रशस्त असून गर्भगृहाच्या चौकटीवर लाकडी शिल्पासारखी कलाकुसर केलेली आहे. पाने, फुले, वेलबुट्टी सुंदर आहे. पायथ्याशी दोन्ही बाजूंना किर्तीमुख व अर्धस्तंभ आहेत.
गर्भगृह प्रशस्त असून तीन शिवपिंडी स्थापित आहेत. या पिंडींची स्थापना कपील मुनींनी केली आहे. त्यामुळे कपिलेश्वर महादेव म्हणून या मंदिराची ख्याती सर्वत्र पसरली आहे. महाशिवरात्रीला येथे मोठी यात्रा भरते, तर श्रावण महिन्यातील प्रत्येक श्रावण सोमवारी अलोट गर्दी असते. परमपूज्य वेदांताचार्य स्वामी हंसानंद तीर्थजी महाराज यांच्या अथक प्रयत्नातून दिनांक १३ ते १५ नोव्हेंबर २००१ या कालावधीत अखिल भारतीय संत समितीचे राष्ट्रीय अधिवेशन महाराष्ट्रात प्रथमच श्रीक्षेत्र कपिलेश्वर येथे संपन्न झाले. मंदिर ट्रस्ट व परिसरातील भाविकांच्या अनमोल सहकार्यामुळे मंदिराला प्रथमच हा मान मिळाला आहे. यावेळी भारतातील सर्वच संत व महंत यांचे आगमन येथे झाले होते. महामंडलेश्वर पूज्य हंसानंद तीर्थ महाराज यांच्या परिश्रमातून येथे वेदशाळेची स्थापना करण्यात आली आहे. अनेक विद्यार्थी येथे वेदाध्ययन करीत असतात. वेदांच्या पवित्र उच्चाराने वातावरणात कमालीचे पावित्र निर्माण होते. परिसरात पाय ठेवताच आपणास भारावल्यासारखे होते. मनाला कमालीचे समाधान लाभते. नदीपात्रात बोटिंगची व्यवस्था असल्याने बाळगोपाळांनाही नौकाविहाराच्या आनंद लुटता येतो.
एकंदरीत एक दिवसाच्या सहलीसाठी मंगळग्रह मंदिर, श्री क्षेत्र सखाराम महाराज वाडी संस्थान व कपीलेश्वर मंदिर असे आयोजन करता येईल.
👇
(प्रसिद्ध शिलालेख वाचक व वीरगळ अभ्यासक श्री.अनिल किसन दुधाने पुणे, यांच्याकडून मिळालेली दोन्ही शिलालेखांची माहिती.)
कपिलेश्वर महादेव मंदिर शिलालेख –मुडावद -अमळनेर
हा शिलालेख जळगाव जिल्ह्यातील अमळनेर तालुक्यातील मौजे निम मुडावद गावी येथील तापी व पांझराआणि कपिल गंगा या तीन नदीच्या संगमावर मध्ययुगीन कपिलेश्वर महादेव मंदिराच्या मुख मंडपावर दर्शनी भागावर आडव्या तुळईवर गणेश पट्टीच्या वर कोरलेला आहे. शिलालेख कोरीव स्वरूपाचा असून २ ओळीचा शुद्ध देवनागरी लिपीत मराठी भाषेत आहे .शिलालेखाची अक्षरे ठळक असून दोन्ही बाजूला उभे दंड चरणरेघा कोरलेल्या असून अक्षरे सुस्पष्ट पणे सहज वाचता येतात.
.गावाचे नाव : निम मुडावद ,ता. अमळनेर, जि. जळगाव
शिलालेखाचे वाचन :
१.॥ श्री गणेशायनम: प्रा.शके १७०५ सा .शके १७०६ क्रोधि(क्रोधिनं) सत ॥
२.॥ पौप वद्य २ तेदिनि सपूर्ण ॥ मास १६ ॥
जी.पी.एस. :-२१.२२ ”३३ ’६१ ,७४ .९४ ’’५२.’ ४७
शिलालेखाचे स्थान :- मंदिराच्या मुख मंडपावर आडव्या तूळईवर कोरलेला आहे.
अक्षरपद्धती : कोरीव स्वरूपाचा लेख आहे.
भाषा : शुद्ध मराठी देवनागरी
प्रयोजन : मंदिर बांधल्याची / बांधकामाची स्मृती जपणे.
मिती / वर्ष : - प्रा.अश्विन शके १७०५शोभन संवत्सर सा.पौष वद्य२शके१७०६क्रोधन संवत्सर,
काळ वर्ष : अठरावे शतक = (२७जानेवारी १७८३ शनिवार - २५ऑक्टोंबर शनिवार ). ते २८ डिसेंबर १७८४ मंगळवार
कारकीर्द :-सवाई माधवराव पेशवे
व्यक्तिनाम:-
शिलालेखाचे संशोधन /वाचक : ,श्री अनिल किसन दुधाने, श्री. संजीव बावस्कर
प्रकाशक :
संक्षेप :- प्रा- प्रारंभ, सा-समाप्त , क्रोधि-क्रोधन , सत-संवत्सर. पौप -पौष ,
संदर्भ:- IE VI- ३६८-३७०
अर्थ :- श्री कपिलेश्वर महादेव मंदिराचे बांधकाम शालिवाहन शकाच्या १७०५ व्या वर्षी सुभानु नाम संवत्सरातील पौष २ म्हणजेच सोमवार २०जानेवारी १७८३ च्या दिवशी चालू होवून शके १७०६ क्रोधि(क्रोधन ) संवत्सर पौष २ म्हणजेच ९. जानेवारी १७८४ शुक्रवार
रोजी मंदिर संपूर्ण बांधून पूर्ण झाले .सदरील मंदिराचे बांधकाम करण्यासाठी एकूण कालावधी १६ महिने लागला ,
शिलालेखाचे महत्व :- उत्तर मराठेशाहीच्या कारकिर्दीत येथे एक मंदिर स्थापन केले .मंदिरावर असलेला शिलालेख हा मंदिराचे बांधकाम सन १७८३ चालू आणि १७८४ साली पूर्ण केल्याच्या संबधित आहे शिवाय सर्व कालावधी १६ महिने लागला हे ही महत्वपूर्ण नोंद आहे .कोरक्याने शिलालेखातील अक्षरांना लघु रूप दिलेलं आहे .तर शिलालेख सुरुवात व शेवटी चरण रेघा आहेत हेच या शिलालेखाचे महत्व आहे.
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कपिलेश्वर महादेव मंदिर नदी घाट शिलालेख –मुडावद अमळनेर
हा शिलालेख जळगाव जिल्ह्यातील अमळनेर तालुक्यातील मौजे निम मुडावद गावी येथील तापी व पांझराआणि कपिल गंगा या तीन नदीच्या संगमावर मध्ययुगीन कपिलेश्वर महादेव मंदिराच्या समोरील तापी नदीच्या घाटावर दीपमाळेच्या खालील चौथरा बांधकामावर नदी घाटाकडे जाणाऱ्या पायऱ्या मार्गावरउजव्या बाजूला भिंतीवर कोरलेला आहे. शिलालेख कोरीव स्वरूपाचा असून २ ओळीचा शुद्ध देवनागरी लिपीत मराठी भाषेत आहे .शिलालेखाची अक्षरे ठळक असून दोन्ही बाजूला उभे दंड चरणरेघा कोरलेल्या असून अक्षरे सुस्पष्ट पणे सहज वाचता येतात.
.गावाचे नाव : निम मुडावद ,ता. अमळनेर, जि. जळगाव
शिलालेखाचे वाचन :
१. श्री कपिलेस्वर च्यरणि
२. निरंतर नारो दादा
३. जि नेवाळकर सके
४. १६८८ व्यय नाम सवछरे
जी.पी.एस. :-२१.२२ ”३३ ’६१ ,७४ .९४ ’’५२.’ ४७
शिलालेखाचे स्थान :- नदीघाटाकडे जाताना दीपमाळेच्या चौथऱ्या खालील भिंतीवर आहे .
अक्षरपद्धती : कोरीव स्वरूपाचा लेख आहे.
भाषा : शुद्ध मराठी देवनागरी
प्रयोजन : नदीवर घाट बांधल्याची / बांधकामाची स्मृती जपणे.
मिती / वर्ष : - शके १६८८ व्यय नाम संवत्सर ,
काळ वर्ष : अठरावे शतक = सन १७६६
कारकीर्द :- माधवराव पेशवे ,
व्यक्तीनाम:- नारोदादाजी नेवाळकर
शिलालेखाचे वाचक : ,श्री अनिल किसन दुधाने
संक्षेप :- कपिलेस्वर-कपिलेश्वर , च्यरणि-चरणी ,सके-शके ,सवछरे-संवत्सरे
संदर्भ:- IE VI- ३३४
अर्थ :- श्री कपिलेश्वर महादेवाच्या चरणी तत्पर असलेले श्री नारोदादाजी नेवाळकर यांनी शालिवाहन शकाच्या १६८८ व्या वर्षी व्ययनाम संवत्सरात म्हणजेच सन १७६६व्या वर्षी तापी नदीवरील घाटाचे काम पूर्ण केले .किवा त्याचा जिर्णोधार केला.
शिलालेखाचे महत्व :- नदी काठी नेहमी संस्कृती नांदत असते सन १७६६ साली तापी नदीवरील घाटाचे काम नारोदादाजी नेवाळकर यांनी पूर्ण केल्याच्या शिलालेख घाटावर लावलेला आहे . नदीवर घाट किवा मंदिर बांधणे हे एक समाजाचे लोकोपयोगी कार्य आहे .यावरून ते सामाजिक ,धार्मिक वृत्तीचे होते हे सिद्ध होते मराठा स्थापत्याच्या दृष्टीने या घाटाचे बांधकाम फार महत्व पूर्ण आहे याच बरोबर मराठेशाहीचा उत्तरे कडील धार्मिक विस्तार याची माहिती मिळते हेच या शिलालेखाचे महत्व आहे.
✍🏻©संजीव बावसकर
नगरदेवळे
जळगाव
(आपणास हे सदर कसे वाटले, लाईक करा,आपले मत मांडा,दुरुस्ती करता येईल.छेडछाड करू नका.)

Friday, 28 July 2023

भारत का महान चोल राजवंश

 


भारत का महान चोल राजवंश : इतिहास की दृष्टि में
चोल शासन की स्थापना 848 ईसवीं में विजयालय नाम के एक चोल राजा ने की। विजयालय ने ही दोबारा दक्षिण में चोल राजवंश की पकड़ बनानी शुरू की। उनके बाद के चोल राजाओं ने पांड्या, पल्लव, राष्ट्रकूट और चेर शासकों से कई युद्ध लड़े और एक बड़ा दक्षिण भारतीय क्षेत्र चोल शासन के अधीन कर लिया। इसी दौर में तंजौर उनकी राजधानी बनी। उसके बाद 985 ईसवीं में राजा बने राजराज चोल। राजराज बेहद पराक्रमी राजा थे। उन्होंने पल्लव, पांड्या, चालुक्य और चेर राजाओं के कई और क्षेत्र जीतकर अपने साम्राज्य में जोड़े।
दक्षिण भारत में अपार सफलताओं के बाद भी राजराज चोल अपने साम्राज्य का विस्तार और बढ़ाना चाहते थे। उनकी इसी नीति के कारण भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ। इतिहास के कालक्रम में पहली बार किसी भारतीय शासक ने दूसरे देशों की तरफ कूच किया। मसलन, राजराज ने श्रीलंका यानी तब के सीलोन पर हमला कर दिया। भारत के बाहर चोल साम्राज्य के विस्तार की यह शुरुआत थी।
राजराज के बाद सन 1014 में उनके बेटे राजेंद्र चोल राजा बने। उन्होंने अपने पिता के साम्राज्य विस्तार के अभियान को आगे बढ़ाया। दक्षिण भारत में अपने विस्तार के बाद राजेंद्र चोल ने उत्तर की तरफ चढ़ाई की। उड़ीसा और बंगाल के कई क्षेत्र जीत लिए। बंगाल में तब पाल राजवंश का शासन था। इस युद्ध के लिए चोल सेना ने गंगा नदी को पार कर हमला किया और विजयी रहे। इसी के बाद राजेंद्र चोल ने दक्षिण में कृष्णा नदी के किनारे एक नई राजधानी बसाई जिसका नाम रखा गया ‘गंगईकोंडाचोलपुरम’ जिसका अर्थ था ‘गंगा को जीत लेने वाले चोल का नगर’। यहां तक कि बंगाल की खाड़ी जो दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी है इसका प्राचीन नाम चोल झील ही था। यह नाम कई सदियों तक चोलों की महानता को बयां करता रहा। बाद में इसका नाम कलिंग सागर किया गया और फिर अंग्रेजों ने इसका नाम बदलकर बंगाल की खाड़ी रख दिया।
अक्सर यह सवाल उठता है कि दूसरे देशों में जाकर चोल राजाओं के युद्ध लड़ने और जीतने के पीछे राज़ क्या था। कहते हैं इसका सबसे बड़ा कारण था उनकी पराक्रमी और अपने समय की अत्याधुनिक चोल नौसेना। इतिहास में उस समय चोल साम्राज्य की नौसेना का लोहा पूरे विश्व ने माना था। राजेंद्र चोल ने दक्षिण एशिया के एक दो नहीं बल्कि कई देशों पर हमला किया और सफलता पाई। एक समय ऐसा आया जब मालदीव्स, श्रीलंका, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, सिंगापुर जैसे कई दक्षिण ऐशियाई देशों में चोल सेना ने अपना दबदबा कायम कर लिया। इनमें से ज्यादातर देशों के व्यापार और धन सम्पदा पर चोलों ने अपना आधिपत्य स्थापित किया और अपनी ताकत के बल पर उनसे अपनी अधीनता स्वीकार कराई।
चीन के साथ व्यापार सम्बन्ध बढ़ाने के लिए राजेंद्र चोल ने कई राजनयिक वहां भेजे और वहां अपने दूतावास बनाए। इसी दौर में दक्षिण एशिया के ज्यादातर बंदरगाहों और समुद्री व्यापार मार्गों पर चोलों का वर्चस्व हो चुका था। इस बहुआयामी बल ने चोलों को मालदीव से फिलीपींस और उत्तर भारत तक फैले अपने विशाल साम्राज्य में सैन्य, राजनीतिक और सांस्कृतिक आधिपत्य बनाए रखने के लिए सक्षम बनाया। कहा जाता है कि अपनी विलक्षण नौसेना और व्यापार कौशल के बल पर ही चोल शासक रोम से चीन तक अपना व्यापार फैला पाए और उन्होने अकूत धनसंपदा हासिल की।
इसे भी चोल नौसैनिक प्रभाव ही कहा जाएगा कि दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों की भाषा, कला, धर्म और वास्तुकला में भारतीय संस्कृति का खासा असर आज भी दिखता है। इंडोनेशिया का बाली हिन्दू धर्म और वियतनाम की चाम संस्कृति को दक्षिण एशियाई देशों में चोल आधिपत्य की एक स्थायी विरासत माना जा सकता है।
(साभार)

कैलासा मंदिर लेणी क्रमांक 16, एलोरा लेणी औरंगाबाद महाराष्ट्र भारत

 


कैलासा मंदिर लेणी क्रमांक 16, एलोरा लेणी औरंगाबाद महाराष्ट्र भारत
कैलासा मंदिराला एलोरा लेणीची 'गुफा 16' म्हणून डब करण्यात आली आहे, आणि जगातील सर्वात मोठी एकाधिकार रचना आहे जी एका दगडापासून कोरली गेली आहे. मंदिराच्या प्रभावी आकाराव्यतिरिक्त, त्याच्या शिल्पकारांसाठी, तसेच त्याच्या इतर वास्तु घटकांच्या उत्तम कारीगरीसाठीही उल्लेखनीय आहे. कैलासा मंदिर [कैलासनाथ म्हणून देखील ओळखले जाते (जे 'कैलासाचा राजा' मंदिर आहे] हे पश्चिम भारतीय भागात वसलेले प्राचीन हिंदू मंदिर आहे.
हे मंदिर एलोरा लेणीचा (युनेस्को जागतिक वारसा स्थान) भाग आहे, ३४ खडक-कट मॉनेस्टर आणि मंदिरांचा समावेश असलेले धार्मिक परिसर आहे. हिंदू देवता शिवाचे हिमालयन स्थान असलेल्या कैलासा पर्वत येथून या मंदिराचे नाव आहे. हे मंदिर 8 व्या शतकात ईस्वीमध्ये बांधले गेले, असे मानले जाते की, राष्ट्रकुटा साम्राज्यातील राज्यकर्ता कृष्ण प्रथम यांच्या काळात. कैलासा मंदिर शिवपर्वताचे प्रतिनिधित्व करणार असल्याने हे मंदिर या विशिष्ट हिंदू देवाला समर्पित केले होते. कैलासा मंदिराचे बांधकाम इ.स. 757 ते 783 दरम्यान झाले असे वाटते. साधारणपणे अंदाज आला आहे की सुमारे अडीच दशकांच्या या कालावधीमध्ये, चारानंद्री टेकडीमधील एका ऊर्ध्वाधर बेसाल्ट खड्यातून एकूण 200,000 (इतर अंदाज 150,000 ते 400,000) टन खडक उत्खनन करून भव्य मंदिर तयार करण्यात आले. हे मंदिर वरून खालपर्यंत फक्त साधा हातोडा आणि चिझल्स घेऊन कोरले गेले होते असंही भर पडलं जाईल.
📸 मुकुल बॅनर्जी

महारानी दुर्गावती

दुर्गावती चंदेल जून 1564 के दिन जबलपुर के नरई नाले के पास वीरगति को प्राप्त हो गईं थीं। अबुल फज़ल'

महारानी दुर्गावती के बारे में लिखता है - रानी अचूक निशानेबाज और कुशल शिकारी हैं, अगर वह किसी बाघ इत्यादि जंगली जानवरों के बारे में जान लेती हैं तो तब तक पानी नहीं पीती हैं, जब तक शिकार नहीं कर लेतीं।
रानी दुर्गावती चंदेल का शासनकाल गोंडवाना का स्वर्णयुग माना जाता है, रानी ने प्रजा के हितार्थ कई तालाब, कुएँ, धर्मशाला, बावड़ी इत्यादि का भी निर्माण करवाया। जिनमें उनके नाम से रानीताल, उनके दीवान आधार सिंह के नाम से आधारताल और और उनकी प्रिय दासी के नामपर चेरीताल अभी भी जबलपुर में हैं। गोंडवाना की लूट से अबुल फज़ल को इतना धन और हाथी प्राप्त हुए थे कि उसके मन में बेईमानी भर गई थी, और उसने विद्रोह कर दिया था।
कर्नल विलियम हेनरी स्लीमन लिखता है लोगों की मान्यता है अभी भी रात को पहाड़ियों से रानी की आवाज सुनाई देती है, ऐसे लगता है जैसे वह अपने सैनिकों को बुला रहीं हैं।
महारानी दुर्गावती के बारे प्रायः यह बात प्रचलित है कि वह कालिंजर के चंदेल राजा कीरत राय की कन्या थीं, उनका जन्म 5 अक्टूबर 1524 को दुर्गाष्टमी के दिन हुआ था। उनका विवाह गढ़ा के राजा संग्रामशाह के पुत्र दलपत शाह के साथ हुआ था। विवाह कैसे हुआ था और किन परिस्थितियों में हुआ यह बात अस्पष्ट है।
अबुल-फज़ल के अकबरनामा के अनुसार रानी दुर्गावती महोबा के चंदेल राजा शालीवाहन की कन्या थीं, उनका विवाह गढ़ा के दलपत शाह के साथ हुआ था।
अबुलफज़ल एक बात का जिक्र करता है, वह लिखता है वहाँ (गोंडवाना) यह बात प्रचलित है कि दलपत शाह राजा संग्रामशाह का औरस पुत्र नहीं है, बल्कि एक राजपूत सरदार का पुत्र है, संग्राम शाह ने उसे जन्म के साथ ही गोद ले लिया और अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

 

Sunday, 16 July 2023

📍कोप्पम अर्थात खिद्रापूर ची ऐतिहासिक पार्श्वभूमी

 


📍कोप्पम अर्थात खिद्रापूर ची ऐतिहासिक पार्श्वभूमी :-
खिद्रापूर या गावाचे प्राचीन काळातील नाव कोप्पम असे होते.यास पुरावा म्हणून सुप्रसिद्ध अश्या कोपेश्वर मंदिराच्या दक्षिणेकडील दरवाजाला लागूनच असलेल्या भिंतीवरील शिलालेखात हे नाव आढळते. हा शिलालेख इ.स १२१३ मधील असून यादव राजा सिंघणदेव द्वितीय याचा आहे.तसेच कर्नाटक राज्यातील गुलबर्गा जिल्हा मध्ये येऊर येथील एका शिलालेखात सुद्धा कोप्पम हे नाव येते. हा शिलालेख इ.स १०७७ चा असल्याने खिद्रापूर ची ऐतिहासिक पार्श्वभूमी ११ व्या शतकापर्यंत मागे जाते.

कोपेश्वर मंदिराचे अस्तित्त्व :
१०७७ मध्ये कोपेश्वर मंदिर छोटेखानी का होईना अस्तित्वात असावे याचे कारण येऊर च्या शिलालेखात शंकर आर्य नावाच्या व्यक्तीने पुत्रप्राप्ती साठी कोप्पम मधील कोप्प देवाची ( कोपेश्वर) ची अनेक व्रत करून पूजा केली.

कोपेश्वर : महाराष्ट्राचे कुरुक्षेत्र..!!
महामहोपाध्याय वा.वी.मिराशी यांनी खिद्रापूर परिसराला कुरुक्षेत्राची उपमा दिली आहे.ती किती सार्थ आहे हे आपल्याला पुढील बाबीवरून समजते

१- इ.स ११ व्या शतकाच्या मध्यावर दक्षिणेतून उत्तरेकडे आक्रमणे वाढली होती. परमप्रतापी चोल राजवंश त्यांच्या राज्याच्या सीमा रुंदावत महाराष्ट्रापर्यंत आला होता.त्यावेळी आपला महाराष्ट्र उत्तरं कालीन चालुक्य राजवंशाच्या हाताखाली होता. चौल सम्राट राजाधिराज १ ला याने महाराष्ट्र राज्यावर आक्रमण केले होते. त्याची अजस्त्र सेना अवाढव्य हत्तिदळ, अश्वदळ सह कृष्णा नदीच्या तीरावर येऊन स्थिरावले होते. मंदाध हत्ती व तेवढेच तगडे सैन्य असल्याने खिद्रापूर ला रणभूमीचे स्वरूप आले होते.त्यांना प्रतिकार कार्यासाठी सज्ज होता चालुक्य राजा पहिला सोमेश्वर अर्थात अहमल्लदेव.
ही घटना आहे सन १०५८ ची जेव्हा चालुक्यांनी पराक्रमाची नुसती शर्थच केली नाही तर राजाधिराज चोल चा पराभव करीत त्याच्या सैन्याचा धुव्वा उडविला या लढाईत राजाधिराज चोल मारण पावला. महाराष्ट्राच्या सुपुत्रांचा हा पराक्रमाचा वारसा आहे.जो आज ही सहसा कोणाच्या लक्षात येत नाही म्हणूनच हा सर्व प्रपंच..
(क्रमशः)
©इतिहासदर्पण

Sunday, 2 July 2023

भोकरदन (भोगवर्धन)












भोकरदन (भोगवर्धन)
लेखन ::रामेश्वर जाधव पातळ
महाराष्ट्रातील प्राचीन अवशेषांसाठी प्रसिद्ध असलेले एक स्थळ. हे औरंगाबाद जिल्ह्यातील तालुक्याचे एक ठिकाण आहे. स्थानिक दंतकथा या नगराला कृष्णशत्रू भौमासुराची राजधानी मानते. दंतकथेनुसार याचे नाव भोगवर्धन किंवा भगदनाथ या राजाच्या नावाचा अपभ्रंश होऊन झाले असावे. लोकसंख्या ९,६८० (१९८१). ते खेळणा नदीकाठी सिल्लोड-जाफराबाद रस्त्यावर सिल्लोडच्या पूर्वेस सु. २० किमी.वर वसले आहे. हे ठिकाण उज्जयिनी (उज्जैन) ते पैठण या व्यापारी मार्गावर दण्डक अरण्यात वसले होते, असा प्राचीन वाङ्‌मयात तसेच मार्कण्डेयादी पुराणांत व अनेक उत्कीर्ण लेखांत याचा उल्लेख आढळतो. प्राचीन काळी हे जनपद होते आणि नंतर त्याला विषयाचा (प्रांताचा) दर्जा प्राप्त झाला. येथील रहिवाशांनी सांची व भारहूत येथील स्तूपांच्या बांधणीस दान दिल्याचे उल्लेख तेथील अभिलेखांत आढळतात. माहिष्मतीचा कलचुरी राजा शंकरगण याने भोगवर्धन विषयातील एका गावातील जमीन ब्राह्मणाला दान दिल्याचा उल्लेख ५९७ च्या लेखात आहे. इसवी सनाच्या आठव्या–नवव्या शतकांच्या सुमारास खेळणा नदीच्या काठांवर कोरलेल्या सात खोल्या आणि सभागृहयुक्त एक शैव लेणे इथे आहे; तथापि त्यानंतरचा या गावाचा इतिहास ज्ञात नाही. उत्तर पेशावाईत हे गाव हैदराबादच्या निजामाच्या अखत्यारीत आले. भोकरदनच्या सभोवती प्राचीन तटबंदीचे अवशेष असून जुन्या किल्ल्यात तहसील कार्यालय आहे. गावात जुनी आठ लहान मंदिरे असून त्यांपैकी खंडोबाचे मंदिर मोठे आहे. तेथे प्रतिवर्षी यात्रा भरते. याशिवाय नदीकाठी एक महानुभव पंथाचे प्राचीन मंदिर आहे. दर शनिवारी येथे बाजार भरतो. भोकरदन कांबळी व खंडसरी साखरेसाठी मराठवाड्यात प्रसिद्ध आहे.
शां. भा. देव आणि र. शं. गुप्ते यांच्या मार्गदर्शनाखाली येथे १९७३-७४ साली उत्खनन करण्यात आले. त्यांत पूर्वंसातवाहन, उत्तरसातवाहन आणि सातवाहनोत्तरकालीन भिन्न वस्त्यांचे बहुविध अवशेष आढळले. उत्तरसातवाहन काळातील भारताचा रोमन संस्कृतीशी असलेल्या व्यापारामुळे भोकरदनची भरभराट झाली. या समृद्धीमुळे कलाकौशल्याचे हे केंद्र बनले. उत्खननात कारागिरांची अनेक घरे आढळली असून ती गुळगुळीत जमिनीची व कबेलूंनी शाकारलेल्या छतांची आहेत. पाटा-वरवंटा, जाते, पळ्या, थाळ्या, डाव, झाकण्या, मडकी इ. हरतऱ्हेच्या नित्योपयोगी वस्तू येथील घरांत मिळाल्या, या घरांतील सांडपाणी वाहून जाण्याचीही सोय चांगली होती. उत्खननांत घरांच्या अवशेषांशिवाय काही नाणी, मृण्मूर्ती आणि दागिने सापडले. नाण्यांचे प्रकार आणि आकार भिन्न असून नाण्यांमध्ये काही आहत नाणी तसेच सातवाहन-क्षत्रप-कार्दमक आणि गुप्त राजे यांची तांब्याची, मिश्रधातूंची आणि सोन्याचा मुलामा दिलेली नाणी आढळली. येथे मिळालेल्या अनेक प्रकारच्या व आकारांच्या मण्यांत अफीक, प्रवाळ, रक्ताश्म, इंद्रनील, स्फटिक इ. मूल्यवान खडे आहेत. उत्खननात उपलब्ध झालेल्या बांगड्या हस्तिदंती, शंखाच्या आणि विशेषत्वे तांब्याच्या आहेत.
येथील अवशेषांत सु. सातशे पक्वमृदा वस्तू मिळाल्या. त्यांपैकी मानवप्राणी व पशू यांची शिल्पे वैशिष्ट्यपूर्ण आहेत. इतर वस्तूंत कर्णभूषणे, पूजेची अर्चनाकुंडे व घरगुती वापरातील हस्तिदंती कंगवे, कज्जलशलाका (काजळाच्या डब्या), सोंगट्या, थाळ्या इत्यादींचा समावेश होतो. कर्णभूषणे डाळिंबीच्या फुलांसारखी कलाकुसर केलेली असून भारतात अन्यत्र उपलब्ध न झालेले किन्नरी-पात्र, शिवाय एका झाकणावरील तीन स्त्रियांच्या उर्ध्वांगाची मूठ इ. अवशेष लक्षणीय आहेत.
येथील मानवी शिल्पांतील दोन स्त्री-प्रतिमांपैकी एक इटलीमधील पाँपेई या ठिकाणी १९३०-३१ साली झालेल्या उत्खननात मिळालेल्या स्त्री-प्रतिमेसदृश आहे. दोन दासींच्या मधोमध उभी असलेली ही स्त्री सडपातळ व बांधेसूद आहे. हिचा काळ इ. स. पू. पहिले ते इसवी सनाचे पहिले शतक असावा. सातवाहन काळात भोकरदन हे हस्तिदंती कलावस्तूंचे केंद्र असावे आणि येथील वस्तूंची व्यापारानिमित्त देवाण-घेवाण होत असावी, असे अनुमान केले जाते. त्यामुळे पाँपेई येथे उपलब्ध झालेली स्त्री-प्रतिमा मूळची याच भागातली असावी, असेही म्हणता येईल. यांशिवाय येथील उत्खननात मातृकादेवींच्या दोन शिलामूर्ती मिळाल्या. त्या दोन्ही मूर्ती विशीर्ष असून योनिस्तनयुक्त उत्तानपाद मूर्ती आहेत. त्यांपैकी एका मूर्तीच्या दोन्ही बाजूंस कमळे कोरलेली आहेत. तज्ञांच्या मते त्या इ. स. पाचव्या-सहाव्या शतकांत खोदल्या असाव्यात.
सातवाहन सत्तेच्या अवनतीनंतर पैठणप्रमाणेच या गावाचा रोमशी व्यापार मंदावला असावा आणि हळूहळू त्याचे ऐश्वर्य आणि महत्त्व कमी झाले असावे. पुढे मध्ययुगात या नगरीला थोडे महत्त्व लाभले होते.
मराठी विश्वकोश

हिराबाई पेडणेकर:

  हिराबाई पेडणेकर: मराठीतल्या पहिल्या महिला नाटककार, ज्यांची नाटकं केवळ 'कलावंतिणीचं घराणं' म्हणून नाकारली "पुरुषानेही स्त्रीवर...