Wednesday, 16 November 2022

(भीमबेठका- मानव का आरंभिक विकास स्थल)

















 

(भीमबेठका- मानव का आरंभिक विकास स्थल)
postsaambhar::ब्रिजेश तिवारी 
आज एक ऐसी जगह पर चलते हैं जो बिलकुल गुमनाम सी है इस जगह का नाम है- भीमबेठका (BHIMBETKA), भीमबेटका, भीमबैठिकाकहते हैं.कहते है कि वनवास के समय भीम यहाँ पर बैठते थे इसलिए यह नाम पड़ गया। ये तो सिर्फ किंवदंती है क्योंकि भीम का इस जगह से कोई लेनादेना नही है.
निशान छोडे हैं हमारे उन आदिमानव पूर्वजों ने जो लाखों साल पहले यहाँ स्थित गुफाओं में गुजर-बसर करते थे. जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरते थे. उन्ही दिनों उन्होंने चित्रकारी भी शुरू कर दी. यहाँ स्थित सैंकडों गुफाओं में अनगिनत चित्र बना रखे हैं.इन चित्रों में शिकार, नाच-गाना, घोडे व हाथी की सवारी, लड़ते हुए जानवर, श्रृंगार, मुखौटे और घरेलु जीवन का बड़ा ही शानदार चित्रण किया गया है.
वन में रहने वाले बाघ, शेर से लेकर जंगली सूअर, भैंसा, हाथी, हिरण, घोड़ा, कुत्ता, बन्दर, छिपकली व बिच्छू तक चित्रित हैं। कहीं-कहीं तो चित्र बहुत सघन हैं जिनसे पता चलता है कि ये अलग-अलग समय में अलग-अलग लोगों ने बनाये होंगे। इनके काल की गणना कार्बन डेटिंग सिस्टम से की गयी है जिनमे अलग-अलग स्थानों पर पूर्व पाषाण काल से लेकर मध्य काल तक की चित्रकारी मिलती है.ये चित्र गुफाओं की दीवारों व छतों पर बनाये गए हैं जिससे मौसम का प्रभाव कम से कम हो.
अधिकतर चित्र सफ़ेद व लाल रंग से ही बनाये गए हैं लेकिन मध्यकाल के कुछ चित्र हरे व पीले रंगों से भी निर्मित हैं। प्रयुक्त रंगों में कुछ पदार्थों जैसे मैंगनीज, हैमेटाईट, नरम लाल पत्थर व लकडी के कोयले का मिश्रण होता था. इसमें जानवरों की चर्बी व पत्तियों का अर्क भी मिला दिया जाता था। आज भी ये रंग वैसे के वैसे ही हैं.
भीमबैठका रातापानी अभयारण्य में स्थित है. अभयारण्य की सीमा में घुसते ही फीस देनी होती है जो एक पैदल पर्यटक के लिए दस रूपये है.बाईक के लिये 25 रूपये टिकट है. यह भोपाल से चालीस किलोमीटर दक्षिण में है.यहाँ से आगे सतपुडा की पहाडियां शुरू हो जाती हैं। अच्छी तरह घूमने और जानने के लिए पांच सौ रूपये में गाइड मिल जाते हैं. मैं तो गाइड नही लिया पर भारतीय पुरातत्व विभाग के कर्मचारी कृष्णकुमार बागडे की सहायता से ही विविध जानकारी ली वह मुलत महाराष्ट्र के है तथा वह गत कई वर्षे से यहा अपनी सेवा दे रहे है.
भोपाल से लगभग 50 कि.मी दुर भिमबेटका है पर यहा पहुंचने के लिये भोपाल से पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं नहीं है.मे तो बाईक से परतवाडा से वहा गया था अगर आपके पास साधन हो तो ठीक है वरना हालत खराब जायेगी। होशंगाबाद-भोपाल हायवे से लगभग 5 कि.मी दुर घने जंगलो मे यह अदभूत 15 गुफाये है.
यहाँ रुकने के लिए कुछ नहीं है। शाम को वापस आना ही पड़ता है. मै नर्मदापुरम की होटल मे रूका था वहा रेल्वे स्टेशन के करीब काफी सस्ती ओर अच्छी होटल है मुझे 700 रुपये मे 24 घंटे के लिये अच्छा साफ सुतरा ए.सी कमरा मिल गया दिनांक 13 नवबंर को सुबह 7 बजे नर्मदापुरम के प्रसिद्ध सेठानी घाट पर नर्मदा स्नान कर बाईक से भिमभेटका के लिये निकल गया साथ मे मेरा छोटे साले साहब मनिष मिश्रा थे.
भीमबेटका के बारे में सुन तो रखा था लेकिन इतनी खूबसूरत जगह होगी, ऐसा सोचा नहीं था.मैने इन गुफाओं को देखने गाईड तो नही लिया पर भारतीय पुरातत्व विभाग के कर्मचारी कृष्णकुमार बागडे ने काफी मदत तथा मार्गदर्शन किया क्योकि गत कई वर्षे से बागडेजी की नियुक्ती भिमबेटका मे है.
भीमबैठका की इन गुफाओं की खोज भी महाराष्ट्रीन डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी.1919 मे जन्मे डॉ.विष्णु श्रीधर वाकणकर ने 1957 मे एक रेलयात्रा के दरम्यान रेल्वे लाईन से कुछ दूर यह गुफाये देखी ओर ट्रेन से उतर कर कई वर्षे तक इस क्षैत्र मे रहकर इन गुफाओं का अभ्यास किया तथा सिध्द किया की इन 15 गुफाओं मे बने शैलचित्र लगभग 10 हजार से 30 हजार वर्ष प्राचीन है.कुछ चित्र तो लगभग 1 लाख वर्ष प्राचिन है जो हमारे आदिमानव व्दारा बनाये है इस खोज के लिये डॉ.विष्णु वाकणकर को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानीत किया गया.देश विदेश के लाखो पर्यटक प्रतिवर्ष भेट देते है पर पर्यटको की सुविधा तथा चित्रों की सुरक्षा के लिये आज भी प्रयाप्त सुविधा उपलब्ध नही है.पचरापाषान तथा मध्यपाशान युग मे आदिमानव व्दारा बनाये मध्यप्रदेश
के रायसेन जिले की भिमबेटका को भारत सरकार ने 1990 मे राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया 2003 मे भिमबेटका की गुफाओं की युनेस्को ने विश्वधरोहर मे शामील किया.हमारे आदिमानव का प्रारंभीक स्थल भिमबेटका अदभूत है.

हिराबाई पेडणेकर:

  हिराबाई पेडणेकर: मराठीतल्या पहिल्या महिला नाटककार, ज्यांची नाटकं केवळ 'कलावंतिणीचं घराणं' म्हणून नाकारली "पुरुषानेही स्त्रीवर...