चोल शासन की स्थापना 848 ईसवीं में विजयालय नाम के एक चोल राजा ने की। विजयालय ने ही दोबारा दक्षिण में चोल राजवंश की पकड़ बनानी शुरू की। उनके बाद के चोल राजाओं ने पांड्या, पल्लव, राष्ट्रकूट और चेर शासकों से कई युद्ध लड़े और एक बड़ा दक्षिण भारतीय क्षेत्र चोल शासन के अधीन कर लिया। इसी दौर में तंजौर उनकी राजधानी बनी। उसके बाद 985 ईसवीं में राजा बने राजराज चोल। राजराज बेहद पराक्रमी राजा थे। उन्होंने पल्लव, पांड्या, चालुक्य और चेर राजाओं के कई और क्षेत्र जीतकर अपने साम्राज्य में जोड़े।
दक्षिण भारत में अपार सफलताओं के बाद भी राजराज चोल अपने साम्राज्य का विस्तार और बढ़ाना चाहते थे। उनकी इसी नीति के कारण भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हुआ। इतिहास के कालक्रम में पहली बार किसी भारतीय शासक ने दूसरे देशों की तरफ कूच किया। मसलन, राजराज ने श्रीलंका यानी तब के सीलोन पर हमला कर दिया। भारत के बाहर चोल साम्राज्य के विस्तार की यह शुरुआत थी।
राजराज के बाद सन 1014 में उनके बेटे राजेंद्र चोल राजा बने। उन्होंने अपने पिता के साम्राज्य विस्तार के अभियान को आगे बढ़ाया। दक्षिण भारत में अपने विस्तार के बाद राजेंद्र चोल ने उत्तर की तरफ चढ़ाई की। उड़ीसा और बंगाल के कई क्षेत्र जीत लिए। बंगाल में तब पाल राजवंश का शासन था। इस युद्ध के लिए चोल सेना ने गंगा नदी को पार कर हमला किया और विजयी रहे। इसी के बाद राजेंद्र चोल ने दक्षिण में कृष्णा नदी के किनारे एक नई राजधानी बसाई जिसका नाम रखा गया ‘गंगईकोंडाचोलपुरम’ जिसका अर्थ था ‘गंगा को जीत लेने वाले चोल का नगर’। यहां तक कि बंगाल की खाड़ी जो दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी है इसका प्राचीन नाम चोल झील ही था। यह नाम कई सदियों तक चोलों की महानता को बयां करता रहा। बाद में इसका नाम कलिंग सागर किया गया और फिर अंग्रेजों ने इसका नाम बदलकर बंगाल की खाड़ी रख दिया।
अक्सर यह सवाल उठता है कि दूसरे देशों में जाकर चोल राजाओं के युद्ध लड़ने और जीतने के पीछे राज़ क्या था। कहते हैं इसका सबसे बड़ा कारण था उनकी पराक्रमी और अपने समय की अत्याधुनिक चोल नौसेना। इतिहास में उस समय चोल साम्राज्य की नौसेना का लोहा पूरे विश्व ने माना था। राजेंद्र चोल ने दक्षिण एशिया के एक दो नहीं बल्कि कई देशों पर हमला किया और सफलता पाई। एक समय ऐसा आया जब मालदीव्स, श्रीलंका, मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, कम्बोडिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, सिंगापुर जैसे कई दक्षिण ऐशियाई देशों में चोल सेना ने अपना दबदबा कायम कर लिया। इनमें से ज्यादातर देशों के व्यापार और धन सम्पदा पर चोलों ने अपना आधिपत्य स्थापित किया और अपनी ताकत के बल पर उनसे अपनी अधीनता स्वीकार कराई।
चीन के साथ व्यापार सम्बन्ध बढ़ाने के लिए राजेंद्र चोल ने कई राजनयिक वहां भेजे और वहां अपने दूतावास बनाए। इसी दौर में दक्षिण एशिया के ज्यादातर बंदरगाहों और समुद्री व्यापार मार्गों पर चोलों का वर्चस्व हो चुका था। इस बहुआयामी बल ने चोलों को मालदीव से फिलीपींस और उत्तर भारत तक फैले अपने विशाल साम्राज्य में सैन्य, राजनीतिक और सांस्कृतिक आधिपत्य बनाए रखने के लिए सक्षम बनाया। कहा जाता है कि अपनी विलक्षण नौसेना और व्यापार कौशल के बल पर ही चोल शासक रोम से चीन तक अपना व्यापार फैला पाए और उन्होने अकूत धनसंपदा हासिल की।
इसे भी चोल नौसैनिक प्रभाव ही कहा जाएगा कि दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों की भाषा, कला, धर्म और वास्तुकला में भारतीय संस्कृति का खासा असर आज भी दिखता है। इंडोनेशिया का बाली हिन्दू धर्म और वियतनाम की चाम संस्कृति को दक्षिण एशियाई देशों में चोल आधिपत्य की एक स्थायी विरासत माना जा सकता है।
(साभार)

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