Friday, 18 March 2022

#अपरिचित_ऐतिहासिक_वास्तू_शंभू_महादेव_मंदिर_

 


#अपरिचित_ऐतिहासिक_वास्तू_शंभू_महादेव_मंदिर_
सह्याद्रीच्या पर्वत रांगा ह्या गडकिल्ले व पर्यटन स्थळे म्हणून आपण नेहमी पाहतो पण त्याच सह्याद्रीच्या कुशीत असंख्य ऐतिहासिक वास्तू लपलेल्या आहेत आणि त्या पाहण्यासाठी आणि तिथलं इतिहास जाणून घेण्यासाठी नेहमीच इतिहास प्रेमी उत्सुक असतात असाच एक अपरिचित वास्तूची माहिती आपण घेऊ.
#शंभू महादेव मंदिर*
300 वर्षांपूर्वीची ही गोष्ट मराठशाहीचे सरदार मल्हारराव होळकर एकदा आपल्या सर्व लवाजम्यासह मोहिमेवर असताना चास गावाच्या थोडंस पुढं आणि आत्ताच्या चास कमान धरणक्षेत्र जवळ शंभू महादेवाचा डोंगर आहे त्यावर ससैन्य चढाई करून वर गेले होते, वास्तविक या डोंगराचा आकार पिंडीच्या आकारासारखा असल्याने त्याला शंभू महादेवाचं डोंगर म्हणायचे.मुळात महादेवाला प्रचंड मानणाऱ्या मल्हाररावांनी आपलं सैन्य त्या डोंगरावर आरामासाठी थांबवल असता त्या ठिकाणी त्यांना तब्बल चार शिवलिंग जमिनीतून वर आलेली दिसली मल्हाररावांनी त्या डोंगरावर एक आकर्षक महादेवाचं मंदिर बांधून त्या डोंगराचा जणू जीर्णोद्धार केला.त्यानंतर सरासरी 1884 ते 1887 च्या सुमारास मंदिराचा पुन्हा जीर्णोद्धार करून त्याला चिरेबंदी चावडी बनवली गेली.( वरील गोष्टीचा संदर्भ म्हणजे वन विभागाने मंदिर परिसरात लावलेला माहिती फलक)
मंदिर आत्ताच्या अवस्थेत पाहिलं चिरेबंदी तटबंदी व चावडी च बराचसा भाग पाडून नवीन बांधकाम करण्याचं काम चालू आहे.मंदिरासमोर आकर्षक नंदी असून मंदिराचा सभामंडप हा पूर्वी लाकडी कलाकुसरी मध्ये होता तो पाडून आता भिंती बांधल्या असल्या तरी अजूनही काही भिंतीत लाकडी नक्षीकाम दुसून येतंय, सभागृहाच्या लाकडी बांधकामातील नक्षी अजून पाहायला मिळते. मंदिरासमोर लहान लहान मुर्त्या आहेत तसेच मंदिरात राम लक्ष्मण यांच्या पण नवीन घडणीत बनवलेल्या मुर्त्या आहेत.मंदिराच्या बाहेरच्या बाजूला एक लहान एक खांबांची दीपमाळ व चुन्याच्या घाण्याच चाक पडलेलं आहे.मंदिरच पूर्वीच लाकडी बांधकाम अतिशय आकर्षक असून नक्षी अजून पुरातन संस्कृती चा दाखला देते.मंदिराच्या गाभाऱ्यात चार शिवलिंग असून शंकर पार्वती यांच्या मुर्त्या पण आहेत.मंदिरा बाहेर हनुमानाची मूर्ती आहे.तिच्या समोर महादेवाला वाहिलेले लहान मोठे नंदी आहेत.मंदिराकडे डोंगर चालून जाताना मध्य भागी एक समाधी असून त्यावर पादुका कोरल्या आहेत येणारे जाणारे हौशी लोक त्या समाधीवर दगडाचे बारीक पिरॅमिड तयार करतात.
मंदिर लहानच पण खूप आकर्षक असून ऐतिहासिक आहे.
चास कमान मार्गे भीमाशंकरला जाताना रोड वरच मंदिराच्या नावाचा व माहितीचा फलक वन विभागाने लावलेला आहे त्यामुळे मंदिर शोधायला जास्त कष्ट घयावे लागत नाहीत पण डोंगर चढाई करायला छोटा आहे व दगडी पायऱ्या असल्याने चढाई सोपी आहे. अवश्य भेट द्यावी अशी वास्तू व परिसरात प्रसिद्ध महादेव मंदिर आहे.त्याविषयी कोणाला संदर्भ सह माहिती असेल तर संपर्क करु शकता.
📞 #8275694144#

Friday, 21 January 2022

महाराणा कुम्भा

 


महाराणा कुम्भा राजपूताने के ऐसे प्रतापी शासक थे,
जिनके युद्ध कौशल, विद्वता, कला एवं साहित्य प्रियता की गाथा मेवाड़ के चप्पे-चप्पे से उद्घोषित होती है।
महाराणा कुम्भा जी का जन्म 1403 ई.
में हुआ था। कुम्भा जी चित्तौड़ के महाराणा मोकल के पुत्र थे।
उनकी माता परमारवंशीय राजकुमारी सौभाग्य देवी थी। अपने पिता चित्तौड़ के महाराणा मोकल की हत्या के बाद कुम्भा जी 1433 ई. में मेवाड़ के राजसिंहासन पर आसीन हुए ,तब उनकी उम्र अत्यंत कम थी। कई समस्याएं सिर उठाए उसके सामने खड़ी थी। मेवाड़ में विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियाँ थी,
जिनका प्रभाव कुम्भा जी की विदेश नीति पर पड़ना स्वाभाविक था।
ऐसे समय में उनको प्रतिदिन युद्ध की प्रतिध्वनि गूंजती दिखाई दे रही थी।
उनके पिता के हत्यारे चाचा, मेरा (महाराणा खेता की उपपत्नी का पुत्र) व उनका समर्थक महपा पंवार स्वतंत्र थे और विद्रोह का झंडा खड़ा कर चुनौती दे रहे थे।
मेवाड़ दरबार भी सिसोदिया व राठौड़ दो गुटों में बंटा हुआ था।
कुम्भा जी के छोटे भाई खेमा की भी महत्वाकांक्षा मेवाड़ राज्य प्राप्त करने की थी और इनकी पूर्ति के लिए वह मांडू (मालवा) पहुँच कर वहाँ के सुल्तान की सहायता प्राप्त करने के प्रयास में लगे हुए थे।
दुर्ग बत्‍तीसी' के संयोजनकार-महाराणा कुंभा
दुर्ग या किले अथवा गढ किसी राज्‍य की बडी ताकत माने जाते थे। दुर्गों के स्‍वामी होने से राजा को दुर्गपति कहा जाता था, दुर्गनिवासिनी होने से ही शक्ति को भी दुर्गा कहा गया। दुर्ग बडी ताकत होते हैं, चाणक्‍य से लेकर मनु और राजनीतिक ग्रंथों में दुर्गों की महिमा में सैकडों श्‍लोक मिलते हैं।
महाराणा कुंभा या कुंभकर्ण (शिव के एक नाम पर ही यह नाम रखा गया, शिलालेखों में कुंभा का नाम कलशनृ‍पति भी मिलता है, काल 1433-68 ई.) के काल में लिखे गए अधिकांश वास्‍तु ग्रंथों में दुर्ग के निर्माण की विधि लिखी गई है। यह उस समय की आवश्‍यकता थी और उसके जीवनकाल में अमर टांकी चलने की मान्‍यता इसीलिए है कि तब शिल्‍पी और कारीगर दिन-रात काम में लगे हुए रहते थे।
यूं भी इतिहासकारों का मत है कि कुंभा ने अपने राज्‍य में 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था। मगर, नाम सिर्फ दो-चार ही मिलते हैं। यथा- कुंभलगढ, अचलगढ, चित्‍तौडगढ और वसंतगढ।
सच ये है कि कुंभा के समय में मेवाड-राज्‍य की सुरक्षा के लिए दुर्ग-बत्‍तीसी की रचना की गई, अर्थात् राज्‍य की सीमा पर चारों ही ओर दुर्गों की रचना की जाए। यह कल्‍पना 'सिंहासन बत्‍तीसी' की तरह आई हो, यह कहा नहीं जा सकता मगर जैसे 32 दांत जीभ की सुरक्षा करते हैं, वैसे ही किसी राज्‍य की सुरक्षा के लिए दुर्ग-बत्‍तीसी को जरूरी समझा गया हो :
“श्रीमेदपाटं देशं रक्षति यो दुर्गमन्‍य देशांश्‍च। तस्‍य गुणानखिलानपि वक्‍तुं नालं चतुर्वदन:।। “
(एकलिंग माहात्‍म्‍य 54)
कुंभा के काल में दुर्गों के जो 32 कार्य हुए, वे निम्नांकित है-
**विस्‍तार कार्य –
1. इसके अंतर्गत चित्‍तौडगढ का कार्य प्रमुख है, जिसमें कुंभा ने न केवल प्रवेश का मार्ग बदला (पश्चिम से पूर्व किया) बल्कि नवीन रथ्‍याओं या पोलों, द्वारों का कार्य करवाया और सुदृढ प्रकार, परिखा का निर्माण भी करवाया जो करीब 90 साल तक बना रहा।
2. इसी प्रकार मांडलगढ को विस्‍तार दिया गया।
3. वसंतगढ (आबू) को उत्‍तर से लेकर पूर्व की ओर बढाया गया मगर चंद्रावती को तब छोड दिया गया।
4. अचलगढ (आबू) की कोट को किले के रूप में बढाया गया।
5. और यही कार्य जालोर में भी हुआ।
6. इसी प्रकार आहोर (जालोर) में दुर्ग की रचना को बढाया गया जहां कि पुलस्‍त्‍य मुनि का आश्रम था।
*स्‍थापना कार्य-
7. अपनी रानी कुंभलदेवी के नाम पर कुंभलगढ की स्‍थापना की गई, यह नवीन राजधानी के रूप में कल्पित था, यहां से गोडवाड, मारवाड, मेरवाडा आदि पर नजर रखी जा सकती थी।
8. इसी प्रकार जावर में किला बनाया गया।
9. कोटडा में नवीन दुर्ग बनवाया।
10. पानरवा में भी नवीन किला निर्मित किया गया। झाडोल में नवीन दुर्ग बने।
यही नहीं, गोगुंदा के पास घाटे में निम्नलिखित स्थानों पर कोट बनवाए गए ताकि उधर से होने वाले हमलों को रोका जा सके-
11. सेनवाडा
12. बगडूंदा
13. देसूरी
14. घाणेराव
15. मुंडारा
16. आकोला में सूत्रधार केल्‍हा की देखरेख में उपयोगी भंडारण के लिए किला बनवाया गया।
*पुनरुद्धार कार्य -
कुंभा के काल में निम्नांकित पुराने किलों भी का जीर्णोद्धार किया गया।
17. धनोप ।
18. बनेडा ।
19. गढबोर ।
20. सेवंत्री ।
21. कोट सोलंकियान ।
22. मिरघेरस या मृगेश्‍वर ।
23. राणकपुर के घाटे का कोट ।
24. इसी प्रकार उदावट के पास एक कोट का उद्धार हुआ।
25. केलवाडा में हमीरसर के पास कोट का जीर्णोद्धार किया।
26. आदिवासियों पर नियंत्रण के लिए देवलिया में कोटडी गिराकर नवीन किला बनवाया।
27. ऐसे ही गागरोन का पुनरुद्धार हुआ।
28. नागौर के किले को जलाकर नवीन बनाया गया।
29. एकलिंगजी मंदिर के लिए पिता महाराणा मोकल द्वारा प्रारंभ किए कार्य के तहत किला-परकोटा बनवाकर सुरक्षा दी गई। इस समय इस बस्‍ती का नाम 'काशिका' रखा गया जो वर्तमान में कैलाशपुरी है।
**नवनिरूपण कार्य –
30. शत्रुओं को भ्रमित करने के लिहाज से चित्‍तौडगढ के पूर्व की पहाडी पर नकली किला बनाया गया।
31. ऐसी ही रचना कैलाशपुरी में त्रिकूट पर्वत के लिए की गई।
32. भैसरोडगढ किले को नवीन स्‍वरुप दिया गया।
कुंभा की यह दुर्ग -बत्‍तीसी आज तक अपनी अहमियत रखती है। पहली बार इन बत्‍तीस दुर्गों का जिक्र हुआ है...

ठाकुर रोशन सिंह

 


ठाकुर रोशन सिंह
इनका जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में स्थित गांव नबादा में 22 जनवरी, 1892 को हुआ.
इनके पिता जी का नाम ठाकुर जंगी सिंह था और माता जी का नाम कौशल्या देवी था. Roshan Singh कुल पांच भाई बहन थे. जिनमे ये सबसे बड़े थे. इनका परिवार आर्य समाज से जुड़ा हुआ था. इसी कारण उनके ह्रदय में देश प्रेम की भावना बचपन से ही थी.
असहयोग आन्दोलन
गाँधी जी द्वारा चलाये जा रहे असहयोग आन्दोलन में रोशन सिंह ने भी बढचढ कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ अपना योगदान दिया जिसमे उन्होंने उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर और बरेली ज़िले के ग्रामीण क्षेत्र में जाकर असहयोग आन्दोलन के प्रति लोगो को जागरूक किया और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ़ आवाज़ उठाई.
गोली काण्ड में सजा :
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में उसी दौरान पुलिस द्वारा हुयी झड़प में उन्होंने पुलिस वाले की रायफल छीन ली और उसी रायफल से उन्ही पुलिस वालो पर जबर्दस्त फायरिंग शुरू कर दी जिसके कारण पुलिस को वह से भागना पड़ा. लेकिन उसके बाद रोशन सिंह जी को गिरफ्तार कर के उनपे बरेली गोली-काण्ड को लेकर मुकदमा चाय गया और उन्हें दो साल की सजा सुना दी गयी. और उसके बाद उन्हें सेण्ट्रल जेल बरेली भेज दिया गया.
चौरी-चौरा कांड :
5 फ़रवरी 1922 को गोरखपुर के पास एक कसबे में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार की एक पुलिस चौकी को आग लगा दी गयी, जिससे उसमें छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी जिन्दा जल के मर गए थे. तब गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन के दौरान हिंसा होने के कारण अपने द्वारा चलाये गए असहयोग आन्दोलन को बंद कर दिया . आन्दोलन के बंद हो जाने के कारण इससे जुड़े क्रांतिकारियों में बहुत निराश हुयी.
सशस्त्र क्रान्ति :
इसी की बाद शाहजहाँपुर में एक गुप्त बैठक रखी गयी. जिसका उदेश्य राष्ट्रीय स्तर पर अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित कोई बहुत बडी क्रान्तिकारी पार्टी बनाने का क्युकि वो समझ रहे थे कि अहिंसा के जरिये आज़ादी मिलना मुश्किल हैं. सशस्त्र क्रांति ही भारत को स्वतंत्रता दिला सकती हैं.
आखिरी पत्र :
ठाकुर साहब ने 6 दिसम्बर 1927 इलाहाबाद स्थित मलाका (नैनी) जेल की काल-कोठरी से अपने एक मित्र को पत्र लिखा. और इस पत्र को समाप्त करने के बाद आखिरी में अपने एक शेर को लिखा
जिन्दगी जिन्दा-दिली को जान ऐ रोशन, वरना कितने ही यहाँ रोज फना होते हैं.
इलाहाबाद स्थित मलाका (नैनी) जेल में आठ महीने के कारावास के दौरान अंग्रेजो द्वारा तमाम कठनाईयों और उनके अत्याचारों को सहा.
फ़ाँसी की रात :
18 दिसम्बर, 1927 यानि फ़ाँसी से पहली की रात, ठाकुर रोशन सिंह ठीक से सो नहीं पाए और कुछ ही घंटो में जाग गए. और रात में ही ईश्वर की आराधना में लग गए. और सूर्य की किरण के साथ प्रात: शौच आदि से निवृत्त होकर हमेशा की तरह स्नान किया और ईश्वर को ध्यान किया. और कुछ देर अपना ध्यान गीता के पाठ में लगाया.
सब करने के बाद जेल के पहरेदार को आवाज लगायी चलो अब यह सुन कर पहरेदार Roshan Singh को देखता रह गया. इसे तो मौत का डर ही नहीं हैं ये चेहरा हमेशा की तरह सामान्य था. जेल की सलाखों से बहार निकलते हुए जेल की उस कोठरी को प्रणाम किया और हाथ में "गीता" लेकर फांसी घर की तरफ निकल पड़े.
और खुद ही फांसी के तख्ते पर जा खड़े हुए और फांसी के फंदे को चूमा और शेर की तरह तीन बार "वंदे मातरम्" का उद्घोष किया. और उसके बाद "वेद मंत्र" का जाप करते हुए 19 दिसम्बर, 1927 को फ़ाँसी के फंदे झूल गए. और सदा सदा के लिए अमर शहीद हो गए.

राजाओं की शान और शूरवीरता का प्रतीक #किशनगढ़_का_किला (जैसलमेर)

 


राजाओं की शान और शूरवीरता का प्रतीक #किशनगढ़_का_किला (जैसलमेर)
यह किला हूबहू पाकिस्तान के बहावलपुर में मौजूद देरावर किले जैसा नज़र आता है॥
1965 ई के युद्ध में पाकिस्तानी सेना ने इसी किले पर हमला बोला था। जिसके बाद भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब देते हुए वापस खदेड़ दिया था।
- इस किले को हासिल करने के लिए मुगल शासकों ने काफी प्रयास किये थे लेकिन नाकाम रहे । किला मजबूती के साथ-साथ सुंदरता को भी ध्यान में रखकर बनाया गया था।
- इस दुर्ग में 8 से अधिक बुर्ज बने हैं। ये दुर्ग को मजबूती, सुंदरता व सामरिक महत्व प्रदान करते थे।
- आजादी के बाद जैसलमेर रियासत के समय पाकिस्तान के लड़ाके हूर्रो का काफी आंतक किशनगढ़ में रहा। जिससे इसे काफी नुकसान पहुंचा था।
1965 ई के भारत पाक युद्ध में इस किले को खासा नुकसान पहुंचा था। इस किले में देवी की बड़ी-बड़ी प्राचीन मूर्तियां भी है। जैसलमेर के किले जहां पत्थरों से निर्मित है। वहीं, किशनगढ़ का किला पूर्ण रूप से ईंटों से बना है।
जैसलमेर के सोनार किले के साथ ही यह किला भी है जो अपनी सार संभाल के अभाव में जर्जर सा होता जा रहा है॥ मुगल और सिंध शैली का नायाब नमूना यह किला जैसलमेर जिला मुख्यालय से पकिस्तान सीमा की तरफ 145 KM दूर स्थित है॥ सीमा पर बने होने के कारण सुरक्षा के लिहाज से इस किले पर पर्यटकों के आने की पाबंदी लगी हुई है और यही वजह है कि देखरेख के अभाव में यह किला दम तोड़ता नजर आ रहा है॥
इतिहास के अनुसार भागलपुर पाकिस्तान की सीमा के नजदीक जैसलमेर के प्राचीन किशनगढ़ परगने का मार्ग देरावल और मुल्तान की ओर से जाता था॥ बंटवारे से पहले और रियासत काल में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिये इसी रास्ते से होकर जाना पड़ता था॥ ऐसे में सीमा पर बना यह किला ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था॥
इस किले का निर्माण दीनू खां ने करवाया था॥ जिसके वजह से इसका प्रारम्भिक नाम दीनगढ़ था॥ इतिहासकार बताते हैं कि #महारावल_मूलराज द्वितीय ने दुर्ग को हस्तगत करने के लिए सेना भेजी थी॥ समझोते के अनुसार 50,000 रुपये में दुर्ग खरीद लिया ॥ वहाँ जैसलमेर का थाना स्थापित कर कुलदेवता लक्ष्मीनारायण का मंदिर बनवाया॥ इसका नाम बदल कर #कृष्णगढ़ रखा गया था॥ जिसे आज #किशनगढ़ के नाम से जाना जाता है॥
यह किला वास्तुशिल्प संरचना का अद्भुत नमूना है॥ इस किले का निर्माण पक्की इंटों से करवाया गया है और इसमें दो मंजिलें बनी हुई है॥ किले में मस्जिद, महल और पानी का कुआ भी बना हुआ है॥ मुगल और सिंध शैली के मिश्रण से बना यह किला अपनी निर्माण तकनीक में बेजोड़ है॥ यही कारण है कि आज भी उपेक्षा का दंश झेलने के बावजूद यह डटा खड़ा है॥ जानकारों की माने तो इस किले के निर्माण के समय इसमें बने खुफिया दरवाजे इसकी विशेषता रहे है ताकि युद्ध के समय दुश्मनों को चकमा दिया जा सके॥
साल 1965 ई और 71 ई के युद्धों में जब पाक सेना भारतीय सीमा में प्रवेश कर कर काफी आगे आ गई थी, तब इस किले में घुसे सैनिकों (मुजाहिद) यहीं पर भ्रमित हो कर रह गये थे और आगे नहीं बढ पाये थे॥ सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के बावजूद भी यह किला आज उपेक्षा का दंश झेलता जर्जर होने को विवश है॥
सीमा सुरक्षा बल ने किशनगढ़ के पास सैन्य चौकी का निर्माण किया है जहां पर सैकड़ों सैनिक रहते हैं॥
यह किला दिन-ब-दिन अपना स्वरूप खोता जा रहा है ॥
आगामी दिनों में अगर इस किले की ओर गंभीरता पूर्वक नजर नहीं डाली गई तो जमींदोज होता यह किला इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जायेगा॥
कागजों की अगर बात करें तो जैसलमेर के इस सरहदी किले किशनगढ़ को संरक्षित स्मारक बनाया गया है॥ लेकिन जगह-जगह से ढही इसकी दीवारें, अपनी जगह छोड़ती ईंटे, उपेक्षा का दंश झेलती इसकी बुर्जियां, कक्ष और प्राचीर को देखने से यह कहीं भी नहीं लगता है कि इस किले का किसी भी रूप में संरक्षण हो रहा है॥ बदहाली का यह सूरते हाल देख कर अपने आप ही स्पष्ट हो रहा है कि लंबे समय से इस किले की सुंध नहीं ली गई है॥ ऐसे में बदहाली का दंश झेल रहा यह किला किसी भी समय ढह जायेगा॥
गौरतलब है कि कला साहित्य, संस्कृति और पुरातत्व विभाग की ओर से जैसलमेर के आस पास बने #घोटारू, #गणेशिया और #किशनगढ़ किले को भी संरक्षित स्मारक घोषित करने के लिये इसका निरीक्षण कर इसकी रिपोर्ट तैयार करने के लिये एक दल भी आया था॥ इसमें पुरातत्व अधीक्षक सहित जैसलमेर संग्रहालय अध्यक्ष भी शामिल थे॥ इस निरीक्षण दल की तरफ से बनाई गई रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने अधिसूचना जारी कर आपत्तियां मांगी गई थी॥ आपत्तियां नहीं मिलने की स्थिति में कला, साहित्य, संस्कृति और पुरातत्व विभाग ने राजस्थान स्मारक पुरावशेष स्थान और प्राचीन वस्तु अधिनियम 1961 के तहत राज्य सरकार की ओर से घोटारू, गणेशिया और किशनगढ़ किले को संरक्षित स्मारक घोषित करने की घोषणा 22 नवम्बर 2011 ई में जारी कर दी गई थी॥ संरक्षित स्मारक घोषित होने के बाद यहां के लोगों को उम्मीद जगी थी कि अब इस किले के दिन बदलने वाले हैं लेकिन ऐसा हुआ नहीं॥ सरकारी उपेक्षा के चलते संरक्षित स्मारक होने के बाद भी इस किले की किस्मत संवर नहीं पाई है॥ यह गढ़ अपनी बदहाली पर आज भी आसूं बहा रहा है॥

हिराबाई पेडणेकर:

  हिराबाई पेडणेकर: मराठीतल्या पहिल्या महिला नाटककार, ज्यांची नाटकं केवळ 'कलावंतिणीचं घराणं' म्हणून नाकारली "पुरुषानेही स्त्रीवर...