उत्तराखंड में तिलू-रौतेली हुई, जिसने गढ़वाली भाषा के प्रोत्साहन के लिए बहुत काम किया। यह ऐसी नारी थी जो गुराडा में पैदा हुई और गुराड में पैदा होने के बाद इसने दुश्मनों से लड़ाई लड़ी। नारी होने के बावजूद यह पुरुषों के वेष में रहती थी। हमारे उत्तराखंड के अंदर जब लड़के नाचते हैं तो लकड़ी लेकर सराई खेलते हैं। सराई तलवार चलाने का, सीखने का एक तरीका है। सराई-खेत के अंदर इस तिलू-रौतेली ने अपने दांतों से लगाम को पकड़ा और दोनों हाथों में तलवार लेकर के दुश्मनों को काट डाला। उस स्थान का नाम सराई-खेत है और मैं तिलू-रौतेली को प्रणाम करती हूँ, जिसने गढ़वाल की संस्कृति के लिए, गढ़वाल की भाषा के लिए, गढ़वाल की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। ये गुराड में पैदा हुई थी। हमारी उत्तराखंड की पहले मंत्री रही हैं, अमृता रावत जी, उन्होंने जणदा-देवी में और भैरो-खाल के अंदर तिलू-रौतेली की मूर्ति को प्रतिष्ठित किया।
यह ऐसी वीरांगना थी जिसके बारे में लोगों ने कहा कि झांसी की रानी की तो फौज थी, पर जो तिलू-रौतेली हुई है, इसकी कोई फौज नहीं थी। इसने अपनी सहेलियों को लेकर, लुहार को लेकर के, जन-मानस को लेकर के, एक सेना बनाई और दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिये। आज उत्तराखंड ऐसी वीरबाला को प्रणाम करता है।
तीलू रौतेली, गढ़वाल की एक ऐसी वीरांगना जो केवल 15 वर्ष की उम्र में रणभूमि में कूद पड़ी थी और सात साल तक जिसने अपने दुश्मन राजाओं को छठी का दूध याद दिलाया था। 15 से 20 वर्ष की आयु में सात युद्ध लड़ने वाली तीलू रौतेली संभवत विश्व की एक मात्र वीरांगना है।
परिचय
तीलू रौतेली का जन्म पौड़ी गढ़वाल के गुराड गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम भूपसिंह था, जो गढ़वाल नरेश की सेना में थे। तीलू रौतेली का जन्म कब हुआ, इसको लेकर कोई तिथि स्पष्ट नहीं है। लेकिन गढ़वाल में 8 अगस्त को उनकी जयंती मनायी जाती है और यह माना जाता है, कि उनका जन्म 8 अगस्त 1661 को हुआ था।
तीलू रौतेली श्री भूपसिंह (गोर्ला) रावत की पुत्री थी, 15 वर्ष की आयु में तीलू रौतेली की सगाई इडा गाँव (पट्टी मोंदाडस्यु) के भुप्पा सिंह नेगी के पुत्र के साथ हुई। इन्ही दिनों गढ़वाल में कन्त्यूरों के लगातार हमले हो रहे थे, और इन हमलों में कन्त्यूरों के खिलाफ लड़ते-लड़ते तीलू के पिता ने युद्ध भूमि प्राण न्यौछावर कर दिये। इनके प्रतिशोध में तीलू के मंगेतर और दोनों भाइयों (भग्तू और पथ्वा) ने भी युद्धभूमि में अप्रतिम बलिदान दिया।
कौथीग जाने की जिद
कुछ ही दिनों में कांडा गाँव में कौथीग (मेला) लगा और बालिका तीलू इन सभी घटनाओं से अंजान कौथीग में जाने की जिद करने लगी तो माँ ने रोते हुये ताना मारा....
तीलू तू कैसी है, रे! तुझे अपने भाइयों की याद नहीं आती। तेरे पिता का प्रतिशोध कौन लेगा रे! जा रणभूमि में जा और अपने भाइयों की मौत का बदला ले। ले सकती है क्या? फिर खेलना कौथीग!
तीलू के बाल्य मन को ये बातें चुभ गई और उसने कौथीग जाने का ध्यान तो छोड़ ही दिया बल्कि प्रतिशोध की धुन पकड़ ली। उसने अपनी सहेलियों के साथ मिलकर एक सेना बनानी आरंभ कर दी और पुरानी बिखरी हुई सेना को एकत्र करना भी शुरू कर दिया। प्रतिशोध की ज्वाला ने तीलू को घायल सिंहनी बना दिया था, शास्त्रों से लैस सैनिकों तथा "बिंदुली" नाम की घोड़ी और अपनी दो प्रमुख सहेलियों बेल्लु और देवली को साथ लेकर युद्धभूमि के लिए प्रस्थान किया।
युद्ध भूमि में पराक्रम
सबसे पहले तीलू रौतेली ने खैरागढ़ (वर्तमान कालागढ़ के समीप) को कन्त्यूरों से मुक्त करवाया, उसके बाद उमटागढ़ी पर धावा बोला, फिर वह अपने सैन्य दल के साथ "सल्ड महादेव" पंहुची और उसे भी शत्रु सेना के चंगुल से मुक्त कराया। चौखुटिया तक गढ़ राज्य की सीमा निर्धारित कर देने के बाद तीलू अपने सैन्य दल के साथ देघाट वापस आयी. कालिंका खाल में तीलू का शत्रु से घमासान संग्राम हुआ, सराईखेत में कन्त्यूरों को परास्त करके तीलू ने अपने पिता के बलिदान का बदला लिया; इसी जगह पर तीलू की घोड़ी "बिंदुली" भी शत्रु दल के वारों से घायल होकर तीलू का साथ छोड़ गई।
अंतिम बलिदान
शत्रु को पराजय का स्वाद चखाने के बाद जब तीलू रौतेली लौट रही थी तो जल श्रोत को देखकर उसका मन कुछ विश्राम करने को हुआ, कांडा गाँव के ठीक नीचे पूर्वी नयार नदी में पानी पीते समय उसने अपनी तलवार नीचे रख दी और जैसे ही वह पानी पीने के लिए झुकी, उधर ही छुपे हुये पराजय से अपमानित रामू रजवार नामक एक कन्त्यूरी सैनिक ने तीलू की तलवार उठाकर उस पर हमला कर दिया।
निहत्थी तीलू पर पीछे से छुपकर किया गया यह वार प्राणान्तक साबित हुआ।
उनकी याद में आज भी कांडा ग्राम व बीरोंखाल क्षेत्र के निवासी हर वर्ष कौथीग (मेला) आयोजित करते हैं और ढ़ोल-दमाऊ तथा निशाण के साथ तीलू रौतेली की प्रतिमा का पूजन किया जाता है।
तीलू रौतेली की स्मृति में गढ़वाल मंडल के कई गाँव में थड़िया गीत गाये जाते हैं।
ओ कांडा का कौथिग उर्यो
ओ तिलू कौथिग बोला
धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धे
द्वी वीर मेरा रणशूर ह्वेन
भगतु पत्ता को बदला लेक कौथीग खेलला
धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धे
सिर्फ 15 साल के उम्र में ही आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़ने वाली उत्तराखंड के गढ़वाल के पौड़ी जिले के चौंदकोट परगना के वीर क्षत्राणी भारत की महान वीरांगना तीलू रौतेली ( क्षत्राणी ) जी को आज़ादी के अमृत महोत्सव पे नमन रहेगा..।।
पूरा हिंदुस्तान सदा तीलू रौतेली ( क्षत्राणी ) जी के देश के लिए किए गए साहसिक कार्यो का ऋणी रहेगा..।।

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